घटते अखाड़े बढ़ते जिम रस्मअदायगी तक सिमटे दंगल

जबलपुर यश भारत। सावन का महीना और नाग पंचमी का त्यौहार से जुड़ी अखाड़े की परंपरा अब रस्म अदायगी तक सिमट कर रह गई है। एक दौर वह भी था जब सावन के महीने और खासकर नाग पंचमी के मौके पर जगह-जगह दंगल और अखाड़े के प्रदर्शन के साथ ही बाजी के आयोजन भी होते थे। लेकिन वर्तमान में जो स्थितियां है उन्हें देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि यह अब गुजरे जमाने की बात हो गई। एक समय ऐसा भी था जब शहर से लेकर ग्रामीण अंचल तक जगह-जगह दंगल होती थी और लोग बड़ी संख्या में पहलवानों की कुश्तीकला देखने भी पहुंचते थे। एक तरफ शहर में ही सैकड़ो की तादाद में अखाड़ा संचालित होते थे तू शायद ही कोई गांव ऐसा रहा होगा जहां अखाड़ा ना होता रहा हो। इन अखाड़ों में प्रतिदिन मल्लविद्या का शौक रखने वाले नौजवान न केवल कुश्ती के हुनर सिखते थे साथ ही कसरत करने भी पहुंचते थे। हर अखाडे का एक उस्ताद होता था जो नौजवानों को दांव पेंच सिखाने के साथ ही कसरत किस तरह करनी चाहिए यह भी बताता था। इसके अलावा व्यायाम शालाओं में पटि बनेटी मुगदर तलवार लाठी चलाना भी सिखाते थे और समय-समय पर खासकर नाग पंचमी के दिन इनका प्रदर्शन भी किया जाता था लेकिन समय के साथ-साथ यह सिर्फ एक औपचारिकता रह गई है। शहर के ज्यादातर अखाड़े अपना अस्तित्व खो चुके हैं गिने चुने अखाड़े ही है जो अपनी परंपराओं के साथ आज भी जुड़े हुए हैं। एक जमाने पर नाग पंचमी पर आयोजित होने वाली बाजी को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ लगती थी लेकिन अब तो जैसे इसकी परंपरा ही समाप्त हो गई है। अखाड़े के प्रति युवाओं का घटता रुझान इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है। अखाड़े की घटती संख्या के कारण कुश्ती कला के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। कुश्ती कला से जुड़े और पुराने लोग बताते हैं कि एक जमाने में शहर के पहलवानों की प्रदीप से लेकर देश तक में तूती बोलती थी। नाग पंचमी के पहले से ही दूर दराज के शहरों और राज्यों से भी बड़ी संख्या में पहलवान यहां आयोजित होने वाले दंगलों में भाग लेने के लिए आ जाते थे। शहर में जंगलों की इतनी भरमार रहती थी कि एक-एक दिन में चार-चार दंगल और वह भी बड़े स्तर के आयोजित होते थे और इन्हें देखने के लिए न केवल शहर बल्कि आसपास के शहरों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे लेकिन समय के साथ सब कुछ बदलता गया और आज शहर में गिने चुने दंगल ही आयोजित होते हैं। पुराने लोगों के अनुसार अब नाग पंचमी पर कुछ ही अखाड़े में आज भी दंगल की परंपरा का निर्वहन हो रहा है। बाकी अखाड़े में तो सिर्फ पूजा पाठ और झंडा चढ़ाने जैसी परंपरा ही बाकी बची है। बताया जाता है कि एक समय अकेले शहर में 100 के करीब अखाड़े थे जिनकी संख्या लगातार घटती जा रही है और अब नाम मात्र के ही उंगलियों में गिननेलायक बचे हैं। यदि आज शहर के प्रमुख अखाड़े की चर्चा की जाए तो इनमें इनमें फकीरचंद उस्ताद का अखाड़ा बुद्धदेव अखाड़ा मथुरा उस्ताद का अखाड़ा धनपत उस्ताद अखाड़ा शंकर सैलानी अखाड़ा सरकारी कुआं अखाड़ा महगू उस्ताद का अखाड़ा गंगाराम अखाड़ा मुल्तानी अखाड़ा आदि के नाम लिए जा सकते हैं। बाकी जो छोटे-मोटे अखाड़े शेष बचे भी है वहां भी गिने चुने लोग ही पहुंचते हैं। और वह भी रस्म अदायगी के लिए।
आज की युवा पीढ़ी का रुझान जिम की ओर
पहले जहां युवा पीढ़ी कसरत और व्यायाम के लिए अखाड़े को महत्व देती थी वही आज की युवा पीढ़ी का रुझान जिम की ओर बढ़ने से शहर के गली कूचों तक में जिमों की बाढ़ सी आ गई है। यहां तक की लोगों ने तो अब अपने घरों में भी जिम बना लिए हैं। जहां पर अत्याधुनिक मशीनों के जरिए युवा युवतियों से लेकर उम्र दराज लोग भी सुबह शाम मसक्कत करते नजर आ जाएंगे। जिम के प्रति लोगों का आकर्षण कितना बड़ा है इसका अंदाजा सुबह शाम जिम के बाहर खड़ी वाहनों की संख्या से ही लगाया जा सकता है। जिम जाने के पीछे लोगों का लॉजिक है अपने आप को फिट रखना लेकिन वास्तविकता तो यह है कि जो बात अखाड़े में थी वह जिम में कहां जिम जाना एक फैशन बनता जा रहा है जहां लोग बाकायदा पैसे देकर अपने आप को फिट बनाने की जुगत में लगे रहते है।
राजेश शर्मा राजू








