मध्य प्रदेशराज्य

मंडरा रहा प्रदूषण का खतरा : इंडो न्यूक्लियर एथेनॉल प्लांट की चिमनी से निकल रहा जहरीला धुआं, रहवासियो ने उठाए सवाल

सतना,  यश भारत । सतना जिले के मझगवां विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत देवलहा के उमरियाहार स्थित इंडो न्यूक्लियर एथेनॉल प्लांट एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। प्लांट की चिमनी से लगातार निकल रहे काले धुएं और आसपास फैल रही राख को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उद्योग से निकल रहा प्रदूषण अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य, जीवन और आजीविका को प्रभावित कर रहा है।

 

क्षेत्र के लोगों का कहना है कि उद्योग की चिमनी से दिन-रात निकलने वाला काला धुआं कई किलोमीटर दूर तक फैलता है, जिससे आसपास की आदिवासी बस्तियों में रहने वाले लोगों को सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। प्रभावितों में बड़ी संख्या मवासी जनजाति के परिवारों की बताई जा रही है, जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग में गिने जाते हैं।

 

ग्रामीणों के अनुसार प्लांट के आसपास स्थित पटनी, कानपुर और डारिन टोला की बस्तियां सबसे अधिक प्रभावित हैं। इन गांवों में रहने वाले लोगों का कहना है कि चिमनी से निकलने वाली कालिख और राख उनके घरों तक पहुंच रही है।

 

लोग बताते हैं कि सुबह घरों के आंगन, छत, पानी के बर्तन और घरेलू उपयोग की वस्तुओं पर काले रंग की परत जमी दिखाई देती है। कई बार भोजन और पेयजल भी इस प्रदूषण से प्रभावित हो जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि उद्योग के संचालन के बाद से उनके जीवन की गुणवत्ता लगातार प्रभावित हो रही है।

 बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा असर

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रदूषण का सबसे अधिक असर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर दिखाई दे रहा है। कई परिवारों ने आंखों में जलन, गले में खराश, लगातार खांसी, सांस फूलने और त्वचा संबंधी समस्याओं की शिकायत की है।

 

ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में स्वास्थ्य परीक्षण या मेडिकल कैंप जैसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है, जबकि प्रदूषण का असर लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे तो भविष्य में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

पर्यावरणीय मानकों के पालन पर उठ रहे सवाल

औद्योगिक इकाइयों के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग अनिवार्य होता है। इनमें बैग फिल्टर, इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रीसिपिटेटर (ESP), डस्ट कलेक्शन सिस्टम और नियमित जल छिड़काव जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

 

साथ ही उद्योग परिसर के चारों ओर ग्रीन बेल्ट विकसित करना भी आवश्यक होता है, ताकि धूल और धुएं का प्रभाव रिहायशी क्षेत्रों तक न पहुंचे। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि इन व्यवस्थाओं का प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं देता। यदि ऐसा है तो यह प्रदूषण नियंत्रण मानकों के उल्लंघन का गंभीर मामला हो सकता है।

 प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर प्रश्न

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय से शिकायतें किए जाने के बावजूद न तो व्यापक जांच कराई गई और न ही प्रभावित गांवों की स्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन किया गया।

 

लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब क्षेत्र में खुले तौर पर प्रदूषण की शिकायतें सामने आ रही हैं तो मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन और संबंधित विभाग अब तक प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं कर पाए हैं। ग्रामीणों का मानना है कि जिम्मेदार एजेंसियों को नियमित निगरानी और निरीक्षण करना चाहिए था।

 

हाल ही में पड़ोसी मैहर जिले में वायु गुणवत्ता प्रभावित होने की शिकायतों के बाद जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जांच दल गठित किया था। उद्योगों की निगरानी बढ़ाई गई और जिम्मेदार संस्थाओं को आवश्यक निर्देश जारी किए गए।

ऐसे में उमरियाहार क्षेत्र के लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब समान परिस्थितियों में दूसरे जिले में कार्रवाई हो सकती है तो सतना में अब तक प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को यहां भी विशेष जांच अभियान चलाना चाहिए।

 किन विभागों की बनती है जवाबदेही

इस पूरे मामले में उद्योग प्रबंधन के साथ-साथ कई सरकारी विभागों की जवाबदेही भी तय होती है। इनमें मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, पर्यावरण विभाग और औद्योगिक सुरक्षा से जुड़े विभाग प्रमुख हैं।

 

इन संस्थाओं का दायित्व है कि वे समय-समय पर निरीक्षण करें, प्रदूषण स्तर की जांच कराएं और किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करें।

 

 ग्रामीणों की प्रमुख मांगें

ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि—

• इंडो न्यूक्लियर एथेनॉल प्लांट की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।

• प्लांट के प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का तकनीकी परीक्षण कराया जाए।

• प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य परीक्षण शिविर आयोजित किए जाएं।

• वायु गुणवत्ता और पर्यावरणीय प्रभावों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए।

• नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर उद्योग प्रबंधन के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाए।

 

• आदिवासी बस्तियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था बनाई जाए।

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