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18 घंटे पहले जो बेटी हंसती-खेलती स्कूल गई थी, अब वो पिता की गोद में लिपटी — मृत पड़ी थी… पढ़िए उस पिता का दर्द, जिसे शैल्वी अस्पताल ने मौत सौंप दी — जीवन नहीं।

यश भारत इनसाइड स्टोरी -पूरी कहानी स्टेप बाय स्टेप

जबलपुर, यश भारत। सिर्फ एक दिन… सिर्फ 18 घंटे पहले तक सब कुछ सामान्य था। सिंगरौली से जबलपुर आए एक पिता की गोद में उसकी 6 साल की मासूम बेटी आर्ची पांडे मुस्कुरा रही थी, स्कूल के लिए तैयार हो रही थी। पर किसे पता था कि यही मासूम सी मुस्कान, अंतिम बार देखी जाएगी।अब उसी गोद में थी वो बेटी…लेकिन न जीवित थी, न मुस्कुरा रही थी — एक निर्जीव शरीर बन चुकी थी।

 “पापा, मैं खेल रही थी… किसी ने धक्का दिया, मैं गिर गई…”ये आर्ची के आखिरी शब्द थे, जो उसने अस्पताल में अपने पिता से कहे। फिर सब कुछ धीरे-धीरे अंधकार में डूबता चला गया।पिता अरुण पांडे की आंखें आज भी नम हैं — वो पल भूल नहीं पाते।

“आपकी बच्ची गिर गई है, अस्पताल ले जा रहे हैं…”

17 जुलाई को सुबह 10:28 बजे आया था स्कूल से फोन। बताया गया, आर्ची गिर गई है और हाथ मुड़ गया है। जब पिता शैल्वी हॉस्पिटल पहुंचे, बेटी जगी हुई थी, होश में थी। डॉक्टर ने कहा – हड्डी टूटी है, ऑपरेशन करना पड़ेगा।”मैंने तुरंत सभी औपचारिकताएं पूरी कीं,” पिता ने बताया, “3:30 बजे ऑपरेशन शुरू हुआ… और 6 बजे डॉक्टर ने कहा, ‘ऑपरेशन सफल रहा।'”

“ऑपरेशन सफल था, तो बेटी क्यों चली गई?”

शाम 7:30 बजे डॉक्टरों ने कहा, “बच्ची को ICU में शिफ्ट किया जा रहा है।”पर जब बेटी ऑपरेशन थिएटर से बाहर आई, तो वेंटिलेटर, ऑक्सीजन मास्क, मशीनें… सब जुड़ी थीं।

डॉक्टर बोले – सब ठीक है, चिंता मत कीजिए। पर पिता की आंखें कुछ और कह रही थीं। उनका दिल चीख रहा था — कुछ तो गड़बड़ है।

रात भर तड़पती रही उम्मीद… और फिर आया वो पल…

रात 4 बजे डॉक्टरों ने कहा – “बेटी की सांसें रुक गई हैं, हम CPR दे रहे हैं…”कुछ मिनटों में घोषणा हुई — बेटी नहीं रही।

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बस… सब खत्म हो गया था।

“हाथ की चोट थी… फिर फेफड़ों में पानी कैसे भर गया?”

पिता ने जब यह सवाल पूछा, तो किसी के पास जवाब नहीं था।

डॉक्टरों ने कहा – लंग्स में पानी भर गया।

 

पर सवाल वही था – क्या सिर्फ एक हाथ की चोट पर इतनी बड़ी सर्जरी जरूरी थी? क्या देखभाल सही से हुई?

📜 शिकायत पत्र पढ़कर कांप उठे लोग — एक पिता का टूटा हुआ दिल, एक इंसाफ की गुहार

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अरुण पांडे ने थाने में जो पत्र दिया है, वो किसी दस्तावेज़ से बढ़कर एक टूटे हुए दिल की चिट्ठी है, जिसमें सिर्फ सवाल हैं — जवाब नहीं।

 “मेरी बच्ची बिलकुल ठीक थी… सिर्फ एक चोट थी…

हॉस्पिटल ने मुझे मेरी बेटी की लाश दे दी — इलाज नहीं…”

 पुलिस ने कहा – जांच के बाद होगी कार्रवाई

माढोताल थाना प्रभारी नीलेश दोहरे ने कहा है कि मामले की जांच की जा रही है, जो भी दोषी होगा, उस पर कानूनी कार्रवाई होगी।

 “जिस बेटी की उंगलियां पकड़कर चलना सिखाया…अब उसी को कांधों पर ले गया…”यह सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं है,

यह सिस्टम की क्रूरता, असंवेदनशीलता और लापरवाही का जिंदा सबूत है।क्या अब भी हम चुप रहेंगे? क्या मासूमों की जान ऐसे ही जाती रहेगी?आवाज़ उठाइए — क्योंकि कल को यह दर्द किसी और का नहीं, आपका हो सकता है।

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