शिकायत दबाने और जांच में गड़बड़ी के आरोपों ने बढ़ाई गंभीरता
एसबीआई महिला अधिकारी आत्महत्या मामला

जबलपुर। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की विजय नगर शाखा की सहायक प्रबंधक आरती शर्मा की आत्महत्या का मामला अब गंभीर विवाद का रूप लेता जा रहा है। मामले में मानसिक एवं लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत पर समय रहते कार्रवाई नहीं करने, जांच प्रक्रिया में कथित हेरफेर और अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।शिकायतकर्ता अधिवक्ता अमर गुप्ता के अनुसार, आरती शर्मा ने 29 मार्च 2025 को मानसिक और लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि शिकायत के बावजूद बैंक स्तर पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जिससे वे लगातार मानसिक तनाव में रहीं। बाद में 25 अक्टूबर 2025 को उन्होंने आत्महत्या कर ली।
शिकायत दबाने और कार्रवाई में देरी के आरोप
जानकारी के मुताबिक, 10 नवंबर 2025 को पुलिस अधीक्षक जबलपुर को शिकायत देकर मामले की जांच की मांग की गई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद मामले को दबाने और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि एसबीआई कॉर्पोरेट सेंटर मुंबई के डीजीएम द्वारा फरवरी और अक्टूबर 2026 में साक्ष्य प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। आवश्यक दस्तावेज और साक्ष्य ईमेल के माध्यम से उपलब्ध कराए जाने के बावजूद अब तक कोई अंतिम कार्रवाई नहीं हुई।
आंतरिक जांच प्रक्रिया पर उठे सवाल
मामले में बैंक की आंतरिक शिकायत समिति की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, गरिमा पोर्टल पर दर्ज शिकायत के बाद समिति की बैठक समय पर आयोजित नहीं की गई। आरोप है कि महिला अधिकारी की आत्महत्या के बाद जांच प्रक्रिया पूरी दिखाने के लिए बैकडेट में बैठक दर्शाई गई। शिकायत में तत्कालीन डीजीएम हरे राम सिंह और सीएम (एचआर) प्रशांत सिंह की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। साथ ही आरोपी कर्मचारी अभय प्रसाद के साथ कथित निकटता के कारण निष्पक्ष कार्रवाई प्रभावित होने की बात कही गई है।
आरटीआई के जरिए मांगी गई जानकारी पर भी विवाद
शिकायतकर्ता ने 11 फरवरी 2026 को सूचना के अधिकार (RTI) के तहत संबंधित सीसीटीवी फुटेज और दस्तावेजों की जानकारी मांगी थी। आरोप है कि इस संबंध में संतोषजनक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, जिससे पूरे मामले की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की सीबीआई या स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने, संबंधित अधिकारियों को जांच के दौरान पद से अलग करने, आरटीआई में जानकारी न देने वालों की जवाबदेही तय करने और दोषियों पर सख्त वैधानिक कार्रवाई की मांग की है। साथ ही पीड़ित परिवार को न्याय और उचित मुआवजा देने की मांग भी उठाई गई है।
तत्कालीन डीजीएम हरे राम सिंह का पक्ष
“सीएमएचआर प्रशांत सिंह और मुझ पर लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह निराधार हैं। इसके बावजूद शिकायतों के आधार पर बैंक प्रबंधन द्वारा आवश्यक एवं उचित कार्रवाई की जा चुकी है।”
— हरे राम सिंह, तत्कालीन डीजीएम







