देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग नाम से मनाया जाता है रक्षाबंधन

जबलपुर यश भारत। श्रावण अथवा सावन हिंदु पंचांग के अनुसार वर्ष का पाँचवा महीना ईस्वी कलेंडर के जुलाई या अगस्त माह में पडने वाला पवित्र माह है।इस वर्ष श्रावण मास 11 जुलाई से आरंभ होकर 9 अगस्त को समाप्त हो रहा है। इसे वर्षा ऋतु का महीना या ‘पावस ऋतु’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस समय बहुत वर्षा होती है। इस माह में अनेक महत्त्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं, जिसमें ‘हरियाली तीज’, ‘रक्षाबन्धन’, ‘नागपंचमी’ आदि प्रमुख हैं। ‘श्रावण पूर्णिमा’ को दक्षिण भारत में ‘नारियली पूर्णिमा’ व ‘अवनी अवित्तम’, मध्य भारत में ‘कजरी पूनम’, उत्तर भारत में ‘रक्षाबंधन’ और गुजरात में ‘पवित्रोपना’ के रूप में मनाया जाता है। त्योहारों की विविधता ही तो भारत की विशिष्टता की पहचान है। इस समय शहर से लेकर ग्रामीण अंचल तक रक्षाबंधन पर्व को लेकर उत्साह का माहौल नजर आ रहा है। इस पर्व के लिये मात्र दो दिन शेष हैं। जिसके कारण एक तरफ जहां शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक राखी रुमाल की दुकान सज गई है वहीं महिलाओं के द्वारा भाई-बहन के पवित्र प्रेम के इस पर्व को मनाने की तैयारी भी जोर शोर से जारी है। बाजार गुलजार हैं शहर के बाजारों का माहौल मेले सा नजर आने लगा है। ऐसी में रक्षाबंधन को लेकर कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां भी हम इस आलेख के माध्यम से साझा कर रहे है।
रक्षा बंधन और सावन …सावन का महीना और रक्षाबंधन दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। रक्षाबंधन, जिसे राखी भी कहा जाता है, हर साल सावन (श्रावण) के महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के बंधन का प्रतीक है। बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, जो उनकी रक्षा और कल्याण के लिए प्रार्थना का प्रतीक है, जबकि भाई अपनी बहनों को हर तरह से उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं,
रक्षाबंधन के दिन पड़ेगा …
सावन का महीना हिंदू कैलेंडर का पांचवां महीना है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इस महीने में, भक्त भगवान शिव की पूजा करते हैं और कई अनुष्ठान करते हैं। सावन पूर्णिमा, जो रक्षाबंधन के दिन पड़ती है, को भी धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. इस प्रकार, सावन का महीना रक्षाबंधन के त्योहार के लिए एक विशेष पृष्ठभूमि प्रदान करता है, जो भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के बंधन को मजबूत करता है.
सावन पूर्णिमा और रक्षाबंधन का संबंध
श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन हिंदू पंचांग में बहुत शुभ और पवित्र माना गया है. इस दिन चंद्रमा पूर्ण रूप से दिखाई देता है और ब्राह्मणों द्वारा वेदों का अध्ययन, यज्ञोपवीत संस्कार और दान-पुण्य की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. यही कारण है कि इस शुभ तिथि पर रक्षाबंधन का पर्व भी मनाया जाता है, क्योंकि यह दिन रक्षा, शुभकामना और आध्यात्मिक पौराणिक कथाएं और रक्षाबंधन से जुड़ी प्रमुख घटनाएं।
इंद्राणी और इंद्र की कथा
भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध चल रहा था, तब देवराज इंद्र की पत्नी शचि (इंद्राणी) ने इंद्र की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक पवित्र सूत्र बांधा. इस सूत्र की शक्ति से इंद्र ने विजय प्राप्त की. यह घटना श्रावण पूर्णिमा की ही बताई जाती है.
कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग
महाभारत में एक घटना के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध किया तो उनका हाथ घायल हो गया. द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनके हाथ पर बांध दिया. यह प्रेम और समर्पण का प्रतीक बना, और कृष्ण ने बाद में द्रौपदी की चीर की रक्षा की. यह भी रक्षाबंधन की भावना को दर्शाता है.
यम और यमुनाजी की कथा
मान्यता है कि यमुनाजी ने अपने भाई यमराज को श्रावण पूर्णिमा के दिन राखी बांधी थी, जिससे प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें अमरता का वरदान दिया. तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि इस दिन बहनें भाइयों की लंबी उम्र की कामना करती हैं.
ज्योतिषीय कारण
सावन पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्णता पर होता है और यह मानसिक और भावनात्मक स्थिरता का प्रतीक माना जाता है. चंद्रमा मन का कारक है और रक्षाबंधन जैसे भावनात्मक पर्व के लिए यह दिन बेहद अनुकूल होता है. यही कारण है कि इस दिन मन से की गई प्रार्थनाएं और शुभ संकल्प विशेष फलदायी माने जाते हैं.
ब्राह्मणों के लिए विशेष दिन
इस दिन ब्राह्मण वर्ग द्वारा ‘उपाकर्म’ संस्कार संपन्न किया जाता है, जिसमें वेदों के अध्ययन और गायत्री मंत्र के जप की शुरुआत होती है. यज्ञोपवीत धारण करना और रक्षा सूत्र बंधवाना एक धार्मिक परंपरा रही है, जो बाद में आमजन के जीवन में बहन-भाई के रक्षाबंधन के रूप में स्थापित हुई.
इसलिए सावन पूर्णिमा का दिन प्राचीन काल से ही रक्षा और सुरक्षा से जुड़े अनुष्ठानों के लिए शुभ माना जाता रहा है. इस दिन बांधा गया रक्षासूत्र न केवल भाई-बहन के प्रेम को दर्शाता है, बल्कि यह नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का प्रतीक भी है.
राजेश शर्मा राजू








