
11 साल से अधिक समय वाले अंडरट्रायल कैदी के मामले पर उच्च न्यायालय सख्त
मुंबई, यश भारत बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक गंभीर यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी द्वारा 11 साल से अधिक समय तक अंडरट्रायल के रूप में जेल में रहने के दावे पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने ट्रायल में हो रही असामान्य देरी को लेकर निचली अदालत से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है और यह जानना चाहा है कि इतने लंबे समय के बावजूद मुकदमे का निपटारा क्यों नहीं हो पाया।
न्यायमूर्ति शिवकुमार डिगे ने 16 जनवरी को आरोपी की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कहा कि यदि आरोपी पिछले 11 वर्ष और 6 महीने से जेल में है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। अदालत ने संबंधित ट्रायल जज से रिपोर्ट मांगते हुए स्पष्ट किया कि इस देरी के कारणों की पूरी जानकारी दी जाए। इसके साथ ही 27 जनवरी को अदालत ने शिकायतकर्ता को भी अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
आरोपी की ओर से पेश वकील सिद्धार्थ जगुष्टे ने अदालत को बताया कि अभियोजन पक्ष ने चार्जशीट में कुल 28 गवाहों का उल्लेख किया है, लेकिन अब तक केवल दो गवाहों के बयान दर्ज हो सके हैं। इनमें से भी एक गवाह का बयान आंशिक रूप से ही दर्ज किया गया है। इससे साफ है कि सुनवाई की गति बेहद धीमी है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक अंडरट्रायल के रूप में जेल में रखना संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार यह दोहरा चुका है कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है।







