
कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों को आउटसोर्स करने पर हाई कोर्ट की रोक
मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश
जबलपुर यशभारत। मध्यप्रदेश के शासकीय स्कूलों में कार्यरत कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों को आउटसोर्स व्यवस्था में लाने के राज्य सरकार के निर्णय पर हाई कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले में राज्य शासन सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। मामले की अगली सुनवाई 17 फरवरी को निर्धारित की गई है।
क्या है पूरा मामला
मध्यप्रदेश के शासकीय स्कूलों में रिक्तियों के अनुसार एक या दो कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों के पद स्वीकृत किए गए थे। भारत सरकार एवं राज्य शासन की नीति के तहत इन पदों पर गेस्ट टीचर फैकल्टी सिस्टम के माध्यम से नियुक्तियां की गई थीं और लंबे समय से इसी व्यवस्था के तहत सेवाएं ली जा रही थीं।
नवंबर माह में दो सत्र पूरे होने के बाद शासन द्वारा आदेश जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि अब गेस्ट टीचर व्यवस्था समाप्त कर आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्तियां की जाएंगी। इसके तहत कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों को गेस्ट टीचर फैकल्टी मैनेजमेंट सिस्टम से बाहर कर दिया गया।
हाई कोर्ट का अहम निर्देश
याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक अगला प्रभावी आदेश पारित नहीं हो जाता, तब तक वर्तमान व्यवस्था जारी रहेगी और कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों की सेवाओं में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
119 कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों की ओर से दायर हुई याचिका
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता आर्यन ऊरमालिया ने कोर्ट को बताया कि प्रदेश में लगभग 92 हजार शासकीय स्कूल हैं और अधिकांश स्कूलों में एक या दो कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर कार्यरत हैं। याचिका में शासन के आदेश को नियम विरुद्ध और अनुचित बताया गया। इस मामले में कुल 119 कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों ने याचिका दायर की थी, जिन्हें हाई कोर्ट से अंतरिम राहत मिली है।
आरक्षण के अधिकार पर पड़ रहा था असर
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि राज्य सरकार के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार यदि कोई अतिथि शिक्षक तीन सत्र या 200 दिन की सेवा पूरी करता है, तो उसे भविष्य की शिक्षक भर्तियों में 50 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलता है।
लेकिन ढाई साल बाद आउटसोर्सिंग में डाल दिए जाने से कंप्यूटर इंस्ट्रक्टरों के तीन सत्र पूरे नहीं हो पाते, जिससे वे इस आरक्षण के लाभ से वंचित हो जाते। इस तथ्य को कोर्ट के समक्ष रखा गया, जिस पर हाई कोर्ट ने गंभीरता दिखाते हुए अंतरिम राहत प्रदान की।







