सावन मै गाये जाने वाले लोकगीत सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता को दर्शाते हैं

जबलपुर यश भारत। सावन का महीना न केवल धार्मिक आस्था बल्कि प्रकृति और परंपरा का सामंजस्य भी है। जिसे बाखूभी लोक संगीत और लोकगीत के माध्यम से भी वर्णित किया जाता रहा है। सावन के महीने में गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत आज भी कहीं सुनाई दिए जाते हैं तो बरबस ही लोगों का ध्यान उस ओर चला जाता है और इन गीतों को सुनकर लोगों को एक सुखद अहसास भी होता है। सावन के मौके पर गाय जाने वाली गीतों में जहां आस्था का समावेश होता है वही प्रकृति परंपरा और संस्कृति का भी सुंदर चित्रण दिखाई देता है। अब यह बात अलग है कि आज के इस नए दौर में लोकगीतों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है लेकिन ग्रामीण अंचलों में आज भी हारमोनियम की धुन ढोलक की थाप और झांझ मजीरों के बीच जब जब टोलिया में पारंपरिक गीतों को गति है तो सुनने वाला मंत्र मुग्ध हो जाता है। सावन में गाए जाने वाले इन लोकगीतों की संख्या न जाने कितने हजारों में होगी हर क्षेत्र हर अंचल के हिसाब से अपने-अपने अलग गीत है जो लोग गेट और सुनते हैं।
लोक संगीत और लोक काव्य का अद्भुत संगम
सावन में चारों ओर हरियाली छा जाती है। खेत लहलहा उठते हैं, नदियां कलकल करती हैं और पेड़-पौधे नये जीवन से भर जाते हैं। यह समय प्रकृति की देवी धरती के श्रृंगार का होता है। भारतीय संस्कृति ने इस मौसम को सिर्फ़ प्राकृतिक बदलाव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे त्योहारों, परंपराओं और लोकगीतों के माध्यम से जीवन में उतार लिया। यहां तक कि काव्य साहित्य में सावन की बड़ी भूमिका रही है।
इस महीने में महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनती हैं, श्रृंगार करती हैं और हरी चूड़ियों, बिंदी, मेंहदी और आलता से सजती हैं। उनके श्रृंगार में सौंदर्य और सौभाग्य दोनों की भावना समाहित होती है। सावन की तीज हो या झूला उत्सव, ये सारे आयोजन नारी जीवन की भावनाओं को जीवंत करते हैं। सावन सिर्फ़ एक मौसम नहीं, यह जीवन का उत्सव है। यह वह समय है जब प्रकृति, परंपरा, प्रेम और श्रद्धा चारों मिलकर एक ऐसी समरसता रचते हैं, जो जीवन को संपूर्ण बना देती है। मिट्टी की महक, बारिश की बूंदें, शिव की भक्ति, झूले की मस्ती, और रिश्तों की मिठास इन सबका अद्भुत समन्वय ही सावन को विशेष बनाता है।
हर बार सावन जब आता है, तो न सिर्फ़ धरती को हरियाली देता है, बल्कि दिलों को भी ताजगी से भर देता है। यही इसकी असली सुंदरता और सार्थकता है।
सावन में पूर्वांचल की गलियों में …सावन के महीने में मध्य प्रदेश में कई पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं। इनमें से कुछ मुख्य हैं: “सैरे” (जो आषाढ़ और सावन में गाए जाते हैं), “मलारें” और “सावन” (श्रावण और भाद्रपद में), और “बाबा या भोला गीत” (क्वार और कार्तिक में). इसके अलावा, बघेलखंड क्षेत्र में भी सावन के महीने में कई लोकगीत गाए जाते हैं, जो वहां की सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता को दर्शाते हैं








