डिंडौरी lआदिवासी बाहुल्य बैगाचक डिंडोरी जिले के बजाग विकास खण्ड का वनांचल क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, आदिवासी परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। वनांचल क्षेत्र में स्थित वनग्राम में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला छेरता त्यौहार न केवल एक धार्मिक व सांस्कृतिक पर्व है, और यह बैगा जनजाति के आपसी भाईचारा और समुदाय की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक आनंद का प्रतीक भी है। इस पर्व के अवसर पर पूरा गांव उत्सव के रंग में रंग जाता है और जंगलों के बीच बसे इस छोटे से वनग्राम में लोकसंस्कृति की अनूठी छटा देखने को मिलती है।
छेरता त्यौहार के अवसर पर चांडा वनग्राम में विशेष उत्साह के मनाया गया है। बैगा समुदाय के लोग कई दिनों पहले से इसकी तैयारी कर रहे थे, घरों की साफ-सफाई, पारंपरिक वेशभूषा सुसज्जित और लोक वाद्य यंत्रों को तैयार किया जाना। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवा और बच्चे तक इस पर्व को लेकर उत्साहित दिखे। यह त्यौहार बैगा समाज की उस परंपरा को दर्शाता है, जिसमें सामूहिकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और आपसी भाईचारा सर्वोपरि माना जाता है।
छेरता पर्व के दिन बैगा पुरुष और महिलाएं अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे दिखाई देते हैं। पुरुष जहां सिर पर पारंपरिक पगड़ी, धोती और कमरबंध पहनते हैं, वहीं महिलाएं रंग-बिरंगे वस्त्रों, पारंपरिक गहनों और साज-सज्जा के साथ नृत्य में शामिल होती हैं। यह वेशभूषा केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि बैगा समाज की पहचान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। उनके वस्त्रों और आभूषणों में प्रकृति से जुड़ी आकृतियां और रंग देखने को मिलते हैं, जो उनके जंगल और पर्यावरण से गहरे संबंध को दर्शाते हैं।
छेरता त्यौहार की सबसे खास विशेषता है घर-घर जाकर नृत्य और गीतों के माध्यम से उत्सव मनाना। बैगा समुदाय के लोग समूह बनाकर पूरे गांव में घूमते दिखाई दिए। ढोल, मांदर और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर पुरुष और महिलाएं सामूहिक नृत्य किया। उनके गीतों में प्रकृति, जीवन, मेहनत, फसल और आपसी प्रेम के भाव झलकते हैं। जब यह नृत्य दल किसी घर के सामने पहुंचा, तो घर के सदस्य उनका स्वागत किया और इस उत्सव में सहभागी बनते हैं। इस परंपरा से गांव के हर घर में उल्लास और एकता का संदेश पहुंचता है।
छेरता पर्व केवल मनोरंजन या उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। यह पर्व बैगा समाज के लोगों को एक-दूसरे के और करीब लाता है। पुराने मतभेद भुलाकर आपसी भाईचारा बढ़ाते दिखे। बुजुर्ग अपने अनुभवों और लोककथाओं के माध्यम से बच्चों और युवाओं को इस पर्व के महत्व से अवगत कराते हैं, जिससे सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहती है।
वनांचल क्षेत्र में रहने वाले बैगा समुदाय का जीवन प्रकृति पर आधारित है। छेरता त्यौहार में भी प्रकृति के प्रति आभार और सम्मान की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। नृत्य और गीतों में जंगल, पहाड़, नदी और फसलों का उल्लेख किया जाता है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि बैगा समाज आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और आधुनिकता के बीच भी अपनी पारंपरिक जीवनशैली को संजोए हुए है।
चांडा वनग्राम में छेरता त्यौहार के दौरान आसपास के गांवों से भी लोग इसे देखने और इसमें शामिल होने पहुंचे। इससे गांव में एक मेले जैसा माहौल बन गया। लोग एक-दूसरे से मिलकर अनुभव साझा करते हैं और आपसी संबंधों को मजबूत करते हैं। यह पर्व क्षेत्रीय एकता और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना को भी सुदृढ़ करता है।
आधुनिक समय में जब आदिवासी संस्कृति और परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती नजर आ रही हैं, ऐसे में छेरता जैसे त्यौहार उनका संरक्षण और संवर्धन करने का कार्य करते हैं। यह पर्व न केवल बैगा समाज की पहचान को जीवित रखता है, बल्कि बाहरी दुनिया को भी उनकी समृद्ध संस्कृति से परिचित कराता है। यदि शासन और समाज के स्तर पर ऐसे आयोजनों को प्रोत्साहन मिले, तो यह सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय पहचान को भी नई दिशा दे सकते हैं।
कुल मिलाकर, डिंडोरी जिले के बजाग विकास खण्ड के चांडा वनग्राम में मनाया जाने वाला छेरता त्यौहार बैगा समुदाय की आत्मा को दर्शाता है। यह पर्व नृत्य, संगीत, परंपरा और भाईचारे का संगम है, जिसमें पूरा गांव एक परिवार की तरह एकजुट होकर उत्सव मनाया । छेरता केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि बैगा समाज की जीवंत सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक जीवन दर्शन का प्रतीक है, जो आज भी पूरी धूमधाम और उल्लास के साथ चांडा वनग्राम में मनाया गया।
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