किसान दंपति के अब है 10 हजार बच्चे : संतान न होने के दुख के बाद उठाया यह कदम…

रीवा । रीवा में एक किसान दंपति के 10 हजार बच्चे हैं. सुनने में अटपटा लगे, पर ये सच है. खाली गोद और समाज के तानों के बीच इस निसंतान दंपति ने कुछ ऐसा कर दिखाया कि अब इनका 10 हजार बच्चों का परिवार है. और तो और लोग अब इन्हें बेहद सम्मान भरी निगाहों से देखते हैं. हम बात कर रहें है विंध्याचल के छोर में बसे एक छोटे से गांव में रहने वाले दीनानाथ और उनकी पत्नी ननकी देवी की. करीब तीन दशकों तक दीनानाथ और ननकी देवी ने कड़ी मेहनत कर 10 हजार पेड़ों का जंगल तैयार कर दिया और गर्व से इन पेड़ों को अपना बच्चा मानते हैं.
दीनानाथ और उनकी पत्नी ननकी देवी ने बताया कि कैसे समाज के तानों को नजरअंदाज करते हुए कड़े परिश्रम और खून-पसीना एक कर उन्होंने 10 हजार पेड़ों का ये परिवार बनाया. ननकी देवी व दीनानाथ कोल का पर्यावरण प्रेम और समर्पण गांव में खाली पड़े 105 एकड़ शासकीय बंजर भूमि को हरा-भरा बना चुका है. 10 हजार पेड़ों को बच्चों की तरह पाल पोसकर इस दंपति ने न केवल पर्यावरण की दिशा में बड़ा मुकाम हासिल किया है बल्कि ताने मारने वाले समाज को भी आइना दिखाने का कार्य किया है.
दीनानाथ और उनकी पत्नी की इस नेक सोच का परिणाम ये है कि आज इस जंगल को “प्रेम वन” के नाम से जाना जाता है. हजारों पेड़ों से पटे इस जंगल में ननकी देवी और दीनानाथ की जोड़ी ने न केवल फलदार वृक्ष रोपे हैं बल्कि गुणकारी औषधि वाले वृक्षों को भी खास जगह दी है.”
रीवा जिले के सिरमौर विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत डभौरा नगर परिषद के धुरकुट गांव में रहने वाले 70 वर्षीय दीनानाथ और 65 वर्षीय उनकी पत्नि ननकी देवी की दास्तां अनोकखी है. 4 दशक पूर्व दीनानाथ कोल और ननकी देवी वैवाहिक बंधन में बंधे थे लेकिन शादी के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी दोनों को संतान प्राप्ति नहीं हुई. इसके चलते दोनों ही समाज के तानों के साथ उपहास का शिकार होने लगे. गांव के लोग उनसे सौतेला व्यवहार करने लगे थे इसी बीच एक दिन पत्नी ननकी देवी ने पति दीनानाथ कोल से कहा कि भले ही हम निसंतान हैं लेकिन हम ऐसा काम करेंगे कि हमारी अलग पहचान बनेगी. बस यही से शुरू हुआ दोनों का एक अनोखा सफर
दीनानाथ कोल और उनकी पत्नि ननकी देवी कहते हैं, ” हमने संतान प्राप्ति न होने का मलाल और समाज के तानों की चिंता छोड़ते हुए पौधे लगाने का संकल्प लिया और अपना जीवन पर्यवरण के लिए समर्पित कर दिया. 1990 की बात है जब हमने हरियाली का पहला बीज बंजर धरती पर बोया था. इस दौरान एक शादी समरोह से लौटते वक्त रास्ते पर कुछ आम की गुठलियां पड़ी हुई मिली थीं. इनमें से ज्यादातर गुठलियां पास ही की 105 एकड़ शासकीय भूमि पर बो दीं. कुछ पौधे खराब भी हुए मगर इसके बावजूद हमने हार नहीं पानी और लगातार बीज बोना जारी रखा.
ननकी और दीनानाथ के प्रयासों से खाली पडी 105 एकड़ शासकीय जमीन को हरे भरे जंगल में तब्दील कर दिया. लगभग 35 सालों के दरमियान दोनों ने मिलकर उस जमीन में तकरीबन 10 हजार से भी ज्यादा पौधे रोप दिए जो वर्तमान में विशाल पेडों का आकर ले चुके हैं. यहां पर लगे पेड़ों की निसंतान दंपत्ति अपनी संतान की तरह सेवा करता है और उनकी रक्षा भी करता है.
दोनों ने बताया कि, “प्रेम वन” में ज्यादातर वृक्ष आम, अमरूद, बेर, आंवला, नीम, बेल, कैथा, बरगद, बांस, और सागोन के लगे हैं. इसके साथ ही कई औषधीय गुणों से भरपूर वृक्ष यहां मौजूद हैं. दीनानाथ और ननकी के एक दूसरे के प्रति प्रेम और पर्यावरण के प्रति समर्पण से तैयार हुआ यह यह प्रेम वन अब केवल हरा भरा जंगल ही नहीं रहा बल्कि खूबसूरत पशु पक्षियों के लिए बेहतर आशियाना भी बन चुका है.
दीनानाथ और ननकी बताते हैं, ” हमारे द्वारा किए गए वृक्षा रोपण को लेकर कई बार वन विभाग द्वारा आपत्ति जताई गई. मगर इसके बावजूद भी हम अपने कार्य पर जुटे रहें. पेड़ों को पानी देने के लिए कई बार खुद से कुंआ खुदवाया मगर अतिक्रमण बताकर उसे पाट दिया गया. नलकूप की स्वीकृति मिलने के बावजूद भी अब तक उसका खनन नहीं हो पाया. इसके बावजूद भो हमने हार नहीं मानी.
दीनानाथ और ननकी की शासन और प्रशासन से मांग है कि इस प्रेम वन को संरक्षित किया जाए. साथ ही इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए. वे कहते हैं, ”हम नहीं चाहते कि हमें इस वन से किसी भी प्रकार का कोई शुल्क मिले या इससे हमें किसी भी प्रकार का कोई लाभ मिले. हम रहें या ना रहें लेकिन यह स्थान सुरक्षित रहे यही यही हमारी इच्छा है.
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. मुकेश येंगल बताते हैं कि “डभौरा क्षेत्र के निवासी दंपति दीनानाथ कोल और उनकी पत्नी ननकी कोल द्वारा 35 वर्षों से किए जा रहे वृक्षारोपण का कार्य बेहद ही प्रेरणा दायक और अद्भुत है. रीवा नगर ही बाग बगीचे और पेड़ों के नाम से जाना जाता रहा है. यहां पर कई ऐसे इलाके हैं, जो पेड़ पौधों के नाम से जाने जाते हैं. कई वर्षों से रीवा में एक परंपरा रही है, जो बड़े बुजुर्ग हुआ करते थे, वे आम के पेड़ों का संस्कार किया करते थे. इसके आलावा वे अपने बगीचे में लगे आम का सेवन खुद नहीं करते थे, क्योंकि आम के पेड़ों को वह अपनी औलाद मानते थे।







