सरकारी स्कूलों में ‘साहब’ बने प्राचार्य बच्चों को पढ़ाना भूले, कार्यालयों तक सीमित; शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

जबलपुर। जिले के शासकीय विद्यालयों में प्राचार्य और प्रधानाध्यापकों का रवैया शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। स्कूल की प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ इन शीर्ष पदधारकों को बच्चों को पढ़ाने के भी स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं, लेकिन लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा 2016 में जारी इस आदेश को आठ सालों से लगातार दरकिनार किया जा रहा है। दुखद बात यह है कि शिक्षा विभाग के अधिकारी भी इस आदेश के पालन को लेकर कोई ठोस पहल नहीं दिखा रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि अधिकांश प्राचार्य और प्रधानाध्यापक अपने आरामदायक कार्यालयों तक ही सीमित रहते हैं, उन्हें क्लासरूम और बच्चों की पढ़ाई से कोई खास सरोकार नहीं रह गया है।
खराब नतीजों के बावजूद नहीं ले रहे जिम्मेदारी
स्कूलों के अकादमिक परिणाम लगातार खराब हो रहे हैं, इसके बावजूद प्राचार्य और प्रधानाध्यापक अपनी शिक्षण संबंधी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभाने से बच रहे हैं। आदेश जारी हुए कई साल बीत बीत चुके हैं, लेकिन व्यवस्था में किसी प्रकार का बदलाव नजर नहीं आ रहा है। वे अपना पूरा समय केवल स्कूल के प्रशासनिक प्रबंधन कार्यों में ही खपा रहे हैं, जबकि उनका दोहरा दायित्व है – प्रभावी प्रबंधन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण। लोक शिक्षण संचालनालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि प्रत्येक प्राचार्य और प्रधानाध्यापक को हर दिन कम से कम दो पीरियड पढ़ाना
अनिवार्य है। उन्हें यह स्वतंत्रता भी दी गई है कि वे अपनी सुविधा और विशेषज्ञता के अनुसार किसी भी कक्षा या विषय का चुनाव कर सकते हैं। इस नियम का मूल उद्देश्य यह था कि वे न केवल शिक्षण प्रक्रिया से सीधे जुड़े रहें, बल्कि छात्रों की अकादमिक प्रगति में सक्रिय रूप से योगदान दें और एक शैक्षिक नेतृत्व प्रदान करें। लेकिन, जमीनी स्तर पर इस नियम का पालन होता नहीं दिख रहा है।
शिक्षकों पर थोपी जाती है खराब रिजल्ट की जिम्मेदारी
नियमों के अनुसार, प्राचार्य या प्रधानाध्यापक जिस भी कक्षा और विषय का अध्यापन करते, उसका वार्षिक परिणाम उन्हीं के नाम से दर्ज किया जाना था, ताकि जवाबदेही तय हो सके। हालांकि, इस महत्वपूर्ण नियम की भी अनदेखी की जा रही है। जब स्कूलों के वार्षिक परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आते, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित विषय शिक्षकों पर डाल दी जाती है और उन्हीं के खिलाफकार्रवाई की जाती है। प्राचार्य
अपनी इस जवाबदेही से पूरी तरह बच निकलते हैं।
कार्रवाई का अभाव और निरीक्षण में ढिलाई
लोक शिक्षण संचालनालय के स्पष्ट आदेशों की लगातार अवहेलना करने वाले स्कूल प्राचार्य और प्रधानाध्यापकों के खिलाफ आज तक कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है। हैरानी की बात यह है कि अधिकारी स्कूलों के निरीक्षण के दौरान केवल शिक्षकों की डेली डायरी की जांच करते हैं, लेकिन प्राचार्य या प्रधानाध्यापकों की डायरी की पड़ताल नहीं की जाती। जबकि, उन्हें भी अपनी डेली डायरी बनानी होती है और उसमें पढ़ाए गए पीरियड और क्लास का विवरण दर्ज करना होता है। यह लापरवाही दर्शाता है कि उच्च स्तर पर भी इन नियमों के पालन को लेकर गंभीरता का अभाव है।
अतिथि शिक्षकों की कमी भी कर सकते हैं पूरी
जिले के कई सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं, जिसके चलते अक्सर अतिथि शिक्षकों की भर्ती करनी पड़ती है। ऐसे में, यदि प्राचार्य या प्रधानाध्यापक अपनी शिक्षण जिम्मेदारी को गंभीरता से लेते हुए क्लासरूम में जाकर दो पीरियड भी पढ़ाना शुरू कर दें, तो कम से कम एक शिक्षक की कमी को तो पूरा किया ही ज ही जा सकता है। दो पीरियड पढ़ाने में आमतौर पर डेढ़ घंटे से अधिक का समय नहीं लगता, जिसके बाद उनके पास स्कूल के अन्य प्रशासनिक कामकाज के लिए पर्याप्त समय बचता है। यह स्थिति हमारी शिक्षा व्यवस्था में एक गंभीर खामी को उजागर करती है, जहां शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी अपने प्राथमिक कर्तव्य यानी शिक्षण से विमुख होते जा रहे हैं।








