कंक्रीट के जंगल में बदल रहा पचमढ़ी,विकास की चादर में कहीं गुम न जाएं पचमढ़ी की वादियां
प्रकृति के साथ खिलवाड़

जबलपुर, यश भारत। सतपुड़ा की वादियों में बसी पचमढ़ी आज अपने प्राकृतिक सौंदर्य से अधिक अवैध निर्माण और बढ़ते व्यावसायिक दबाव को लेकर चर्चा में है। छावनी परिषद पचमढ़ी के पूर्व उपाध्यक्ष हुजैफा बोहरा ने पर्यटन विभाग, भू-माफियाओं और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया है कि पचमढ़ी को धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगल में बदला जा रहा है। उनका कहना है कि जिस पचमढ़ी को पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन के लिए विशेष नियमों के तहत संरक्षित क्षेत्र माना गया था, वहीं आज खुलेआम नियमों की अनदेखी कर बड़े निर्माण कार्य किए जा रहे हैं।

हुजैफा बोहरा ने कहा कि मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग, जो स्वयं एक सरकारी उपक्रम है, उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के दिशा-निर्देशों का पालन करेगा। लेकिन वर्तमान स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। उनके अनुसार पर्यटन विभाग ने कई होटलों और संपत्तियों को निजी कंपनियों को 30-30 वर्षों की लीज पर दे दिया है। इसके बाद इन निजी कंपनियों ने सीमित क्षमता वाले होटलों को बड़े व्यावसायिक होटल कॉम्प्लेक्स में बदलना शुरू कर दिया। जहाँ पहले 10 कमरे होते थे, वहाँ अब 40 से 50 कमरों तक के निर्माण किए जा रहे हैं।
प्रकृति पर बढ़ रहा दबाव, स्थानीय लोगों का रोजगार प्रभावित

बोहरा का कहना है कि इस अनियंत्रित निर्माण का सबसे बड़ा नुकसान पचमढ़ी की प्राकृतिक संरचना को हो रहा है। लगातार बढ़ती भीड़, वाहनों का दबाव और बड़े होटलों की संख्या बढऩे से पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बाहरी कंपनियाँ केवल मुनाफा कमाने के उद्देश्य से पचमढ़ी आ रही हैं, जबकि उन्हें यहाँ की प्रकृति, संस्कृति और स्थानीय लोगों के हितों से कोई सरोकार नहीं है।
उन्होंने कहा कि पहले पर्यटन का लाभ स्थानीय होटल संचालकों, दुकानदारों और छोटे व्यापारियों तक पहुंचता था, लेकिन अब बड़े होटल समूहों ने बाजार पर कब्जा कर लिया है। इसका असर यह हुआ कि छोटे होटल संचालकों की आय घट गई है। गर्मी के सीजन में भी कई छोटे होटल कम किराए पर कमरे देने को मजबूर हैं, जबकि बड़े रिसॉर्ट और होटल हजारों रुपये प्रतिदिन किराया वसूल रहे हैं।
पचमढ़ी अब गरीब और अमीर वर्ग में बंट चुकी है

हुजैफा बोहरा ने दावा किया कि पचमढ़ी अब दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है। एक ओर स्थानीय गरीब परिवार हैं, जो वर्षों से छोटे मकानों और सीमित संसाधनों में जीवन यापन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े कारोबारी और होटल समूह हैं, जिन्होंने भारी निर्माण कर करोड़ों रुपये का व्यवसाय खड़ा कर लिया है। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों को अपने मकान की छोटी मरम्मत तक के लिए अनुमति लेने प्रशासन के चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन रसूखदार लोगों के निर्माण कार्यों पर कोई रोक नहीं लगती।
एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी के आरोप
बोहरा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी ने पचमढ़ी जैसे संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र में निर्माण को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन जारी की हैं। इन नियमों के अनुसार ऐसा कोई निर्माण नहीं होना चाहिए जिससे वादियों, जंगलों और प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंचे। इसके बावजूद खुलेआम पक्के निर्माण किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन, पुलिस और संबंधित विभागों की आंखों के सामने यह सब हो रहा है, लेकिन कार्रवाई नहीं की जा रही। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और कई भू-माफिया सरकारी तंत्र से सांठगांठ कर पचमढ़ी की जमीनों का दोहन कर रहे हैं। बोहरा के मुताबिक यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पचमढ़ी अपनी मूल पहचान और प्राकृतिक सुंदरता खो सकती है।
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