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मेरा यादगार केस: कमरे में वो लोहे की रॉड लिए बैठा था, लेकिन मेरी नजर उसकी चप्पल पर लगे खून के छीटों पर थी…

मेरा यादगार केस: कमरे में वो लोहे की रॉड लिए बैठा था, लेकिन मेरी नजर उसकी चप्पल पर लगे खून के छीटों पर थी…

यूं तो इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते ने कई सनसनीखेज मामलों का खुलासा किया, लेकिन शाहगंज का यह ब्लाइंड मर्डर उनके करियर का सबसे यादगार और रोंगटे खड़े कर देने वाला केस बन गया।

 अरविंद कुमार कपिल 

भोपाल, यशभारत। मध्य प्रदेश पुलिसिंग में कुछ अधिकारी अपने शांत स्वभाव, सिंघम स्टाइल और अचूक खोजी दिमाग के लिए जाने जाते हैं। उन्हीं में से एक हैं इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते (2007 बैच, सीधी भर्ती)। मूल रूप से मंडला के रहने वाले और जबलपुर से आर्ट्स ग्रेजुएट इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते का करियर भोपाल के अशोक गार्डन, बैरसिया, गुनगा और श्यामपुर जैसे थानों में अपराधियों की रीढ़ तोड़ने के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपने सेवाकाल में कई गंभीर अपराधों का खुलासा किया है, लेकिन साल 2021 में सीहोर जिले के शाहगंज थाने में पास्टींग के दौरान खुद का दिमाग लगाकर सुलझाया गया खेरी सिलगेना गांव का यह अंधे कत्ल का मामला उनके दिल के सबसे करीब और यादगार है।

पेश हैं इस खौफनाक केस को लेकर इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते से हुई सीधी बातचीत के मुख्य अंश:

सवाल: कुलस्ते जी, आपने अपने करियर में कई बड़े मामलों का खुलासा किया है, लेकिन शाहगंज का यह केस आपके लिए इतना यादगार क्यों है?

इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते: देखिए, कई केस ऐसे होते हैं जिनमें मोबाइल लोकेशन या कोई चश्मदीद गवाह मिल जाता है, लेकिन शाहगंज का वो केस पूरी तरह ब्लाइंड था। साल 2021 में ग्राम खैरी सिलगेना के एक सुनसान छोर पर 50 साल की एक गरीब मजदूर महिला का शव मिला था। हत्यारे ने किसी भारी चीज से सिर पर इतने वार किए थे कि खोपड़ी पूरी तरह पिचक चुकी थी। लाश के पास पानी का लोटा और कुछ ही दूरी पर खून से सना डंडा पड़ा था। हमारे पास न कोई सुराग था, न कोई गवाह और न ही कोई पुरानी रंजिश। वह खाकी की प्रतिष्ठा की परीक्षा थी, इसलिए यह केस हमेशा के लिए यादगार बन गया।

सवाल: जब चारों तरफ सन्नाटा था और कोई सुराग नहीं था, तब आपने जांच की दिशा कैसे बदली?

इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते: जब कोई रास्ता न दिखे, तो पारंपरिक ढर्रे से हटकर आउट ऑफ द बॉक्स सोचना पड़ता है। यहीं पर मेरा फील्ड का अनुभव और इंसानी व्यवहार को पढ़ने का तजुर्बा काम आया। मैंने घटनास्थल पर मृतक के शव की स्तिथि देख कर समझ गया की इसकी हत्या या तो कोई बड़ी रंजिश हो सकती है अथवा कोई सनकी ही इस तरह की वारदात को अंजाम दे सकता है पहले वाले एंगल पर ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे यह सिद्ध हो की मृतक की हत्या रंजिशन हो फिर दूसरे एंगल पर जाकर काम किया गांव में कोई भी कुछ जानकारी न होना बताते रहे मैंने हिकमतमली से वहां के स्थानीय लड़कों और स्कूली छात्रों को विश्वास में लिया। उनके साथ बैठकर नॉर्मल पूछताछ यानी बेहद दोस्ताना और मनोवैज्ञानिक बातचीत शुरू की। मेरा पूरा फोकस ग्राउंड लेवल पर यह पता लगाना था कि इलाके में कौन जुनूनी व्यक्ति है और किसका व्यवहार अजीब है।

सवाल: और उसी नॉर्मल पूछताछ ने आपको उस सनकी कातिल तक पहुँचाया?

इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते: बिल्कुल। छात्रों और लड़कों से बात करते-करते कड़ियां आपस में जुड़ने लगीं। कुछ युवाओं ने दबी जुबान में एक नाम लिया चौहान। गांव वालों ने बताया कि चौहान वैसे तो चुपचाप रहता है, लेकिन जैसे ही वो गांजा सुलगाता है, उसकी दिमागी नसें तन जाती हैं। गांजे की चिलम फूंकते ही आक्रामक हो जाता है यह सुनते ही मेरे दिमाग की घंटी बजी कि कातिल हो न हो यही है।

सवाल: सुना है कि जब आप उसे पकड़ने गए, तो पूरी पुलिस टीम के सामने जान का संकट खड़ा हो गया था?

इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते: हां, वो क्षण वाकई बहुत तनावपूर्ण था। जब हमारी टीम खेरी सिलगेना में चौहान के ठिकाने पर पहुंची, तो उसने खूंखार जानवर की तरह बर्ताव शुरू कर दिया। वो खाकी को देखते ही बेहद गंदी-गंदी गालियां बकने लगा और हिंसक हो गया। उसकी आक्रामकता इस कदर थी कि दो-तीन बार पुलिस टीम को पीछे हटना पड़ा। वो अपने कमरे के अंदर हाथ में लोहे की भारी-भरकम रॉड लेकर बैठ गया था। जो भी आगे बढ़ता, वो उसका सिर फाड़ देता।

सवाल: फिर आपने अकेले उस कमरे के अंदर उस साइको को कैसे काबू किया?

इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते: मैं बिना किसी हथियार या लाठी के, बिल्कुल शांत और निडर चेहरे के साथ अकेले उसके कमरे में दाखिल हुआ। वो लोहे की रॉड चमका रहा था, गालियां दे रहा था। मैंने उससे बहुत सामान्य लहजे में, बिना डरे बातचीत शुरू की ताकि उसका ध्यान भटके। एक पुलिस अफसर को इस कदर बेखौफ और शांत देखकर वो सनकी अंदर से हड़बड़ा गया। और ठीक उसी बातचीत के गोल्डन सेकेंड्स में, मेरी पारखी नजर उसकी चप्पलों पर जा ठहरी।

सवाल: चप्पल पर ऐसा क्या दिख गया था सर?

इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते: उसकी चप्पल पर खून के बारीक सूखे हुए छीटें लगे थे। बस, मेरा खोजी दिमाग तुरंत भांप गया कि शिकार जाल में आ चुका है। मैंने एक पल की भी देरी किए बिना उस पर झपट्टा मारा और उसे दबोच लिया। थाने लाकर जब कड़ाई से पूछताछ हुई और वैज्ञानिक साक्ष्यों को सामने रखा गया, तो उसकी सनक का किला ढह गया। उसने रोते हुए कबूल किया कि गांजे के अत्यधिक नशे में आई सनक के चलते उसने राह चलती उस बेकसूर महिला का सिर डंडे से कुचल दिया था।

सवाल: आखिरी सवाल सर, इस दिलचस्प केस की सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं?

इंस्पेक्टर नरेंद्र कुलस्ते: इसका श्रेय ग्राउंड इंटेलिजेंस और धैर्य को जाता है। अपराधी कितना भी शातिर हो, वो कोई न कोई सुराग जरूर छोड़ता है। पुलिसिंग सिर्फ ताकत दिखाना नहीं, बल्कि सही समय पर सही दिमाग लगाना है। अगर हम जनता का विश्वास जीत लें, तो बड़े से बड़ा मुजरिम भी बच नहीं सकता। पीड़ित परिवार को न्याय दिला पाना ही मेरी सर्विस की सबसे बड़ी संतुष्टि है।

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