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बाराबंकी में ‘कुर्सी का मोह’ या ‘पैसों का खेल’? 15 ब्लॉकों में सालों से जमे सचिवों पर उठे गंभीर सवाल!

📍 इन 15 ब्लॉकों में चल रहा है कुर्सियों का 'सिंडिकेट':

बाराबंकी में ‘कुर्सी का मोह’ या ‘पैसों का खेल’? 15 ब्लॉकों में सालों से जमे सचिवों पर उठे गंभीर सवाल!

बाराबंकी: विकास भवन से लेकर गांवों की गलियों तक इस वक्त एक ही चर्चा गर्म है—आखिर इन साहब लोगों को एक ही ब्लॉक से इतना लगाव क्यों है? बाराबंकी जिले में नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए ग्राम सचिव और ग्राम विकास अधिकारी अपनी समयावधि पूरी होने के बाद भी अंगद की तरह पैर जमाए बैठे हैं। वह अपनी कुर्सियों से इस तरह चिपक गए हैं जैसे ब्लॉक न हो गया, उनका निजी घर बन गया हो!
ग्रामीणों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है। उनका सीधा और खुला आरोप है कि इस ‘परमानेंट’ तैनाती के पीछे कोई प्रशासनिक मजबूरी नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे ‘पैसों का बड़ा खेल’ चल रहा है। मलाईदार ब्लॉकों में टिके रहने और ट्रांसफर रुकवाने के लिए अंदरखाने मोटी रकम का लेन-देन किया जा रहा है। जनता परेशान है और साहब लोग अपनी जेबें गर्म करने में मस्त हैं।

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📍 इन 15 ब्लॉकों में चल रहा है कुर्सियों का ‘सिंडिकेट’:

जिले के जिन ब्लॉकों में नियमों को ठंडे बस्ते में डालकर अधिकारी जमे हुए हैं, उनकी सूची इस प्रकार है:
बंकी
मसौली
देवा
हरख
फतेहपुर
हैदरगढ़
दरियाबाद
सूरतगंज
सिद्धौर
पूरे डलई
निन्दूरा
त्रिवेदीगंज
रामनगर
सिरौली गौसपुर
बनीकोडर

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क्या हैं सरकारी नियम? (तबादला नीति की सच्चाई)
प्रशासनिक पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सरकार ने स्पष्ट नियम बनाए हैं, लेकिन बाराबंकी में इन नियमों को ताक पर रख दिया गया है:
3 साल का अनिवार्य नियम: उत्तर प्रदेश शासन की कार्मिक नीति और तबादला नीति के अनुसार, समूह ‘ग’ (जिसमें ग्राम सचिव और ग्राम विकास अधिकारी आते हैं) के किसी भी कर्मचारी को एक ही विकास खंड (ब्लॉक) में अधिकतम 3 वर्ष से अधिक समय तक तैनात नहीं रखा जा सकता।
भ्रष्टाचार पर रोक का नियम: एक ही जगह पर लंबे समय तक टिके रहने से अधिकारियों और स्थानीय बिचौलियों के बीच साठगांठ हो जाती है। इसी भ्रष्टाचार और पक्षपात को रोकने के लिए ‘पटल परिवर्तन’ (सीट बदलना) और ब्लॉक ट्रांसफर का नियम बनाया गया है।
गृह क्षेत्र पर पाबंदी: कोई भी कर्मचारी अपने गृह ब्लॉक या उससे बिल्कुल सटे हुए क्षेत्रों में तैनात नहीं हो सकता ताकि वे स्थानीय राजनीति या व्यक्तिगत लाभ से दूर रहकर निष्पक्ष काम कर सकें।
अब देखना यह है कि इस मसालेदार खुलासे के बाद जिला प्रशासन की नींद टूटती है या फिर ‘पैसों का यह खेल’ इसी तरह नियमों की धज्जियां उड़ाता रहेगा!

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