मुक्ति के इंतजार में सालों से तालों में बंद अस्थियां, प्रियजनों की अस्थियां एकत्रित तो की लेकिन विसर्जन करना भूल गये ? देखे वीडियो …..

जबलपुर, यशभारत / भारत, आस्थाओं का देश है, जहां प्रियजनों की मृत्यु के बाद सांस्कारिक मुक्ति के लिए कई विधान है । जिसमें पहला – अग्नि संस्कार, फिर अस्थियों का संकलन, जिसे खारी भी कहते हैं। इन अस्थियों का दसवें दिन गंगा जी अथवा नर्मदा जी में विसर्जन कर तेरहवें दिन त्रियोदशी संस्कार (गंगाजली पूजन) का विधान है। लेकिन गौरीघाट श्मशान भूमि में दर्जनों ऐसी अस्थियां रखी हुई हैं, जिन्हें महिनों और वर्षों बाद भी परिवार जनों द्वारा विसर्जित नहीं किया गया है। ऐसे में श्मशान भूमि में काम करने वाले पशोपेश की स्थिति में हैं।
भारत में स्पष्ट मान्यता है कि जीव अजर- अमर है, जिसे न कोई जला सकता है और न ही अस्त्र-शस्त्र से काट सकता है। गीता का यह संदेश भी अमर है। हां ,शरीर को नश्वर माना गया है। अतः मनुष्य की मृत्यु के बाद सभी अपनी-अपनी रीति से मृत शरीर को अग्नि संस्कार देते हैं अथवा कुछ लोग दफन भी करते हैं। अंतिम संस्कार की इन रीति-रिवाजों में अस्थियों के विसर्जन की मूल परंपरा है । माना जाता है कि जब तक अस्थियां पवित्र नदियों में विसर्जित न की जाये जीवात्मा भटकती रहती हैं। मोह-माया से जुड़ा मृत जीव मुक्ति प्राप्त नहीं करता। अतः लोग अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के तीसरे दिन अस्थियों का संकलन कर उन्हें किसी पेड़ में घट स्थापित कर दसवें दिन पवित्र नदियों में विसर्जित कर देते हैं।
लेकिन आजकल स्थानाभाव के कारण श्मशान भूमि में ही उपलब्ध लॉकरों में अस्थियों को रखने की व्यवस्था की जाती है, जिसकी चाबी परिवार जनों के पास रहती है। जहां से लोग 10 दिनों के भीतर उन्हें ले जाकर विसर्जित कर देते हैं। लेकिन गौरीघाट श्मशान भूमि में दर्जनों ऐसी अस्थियां रखी हुई हैं, जिनका कोई धनी धोरी नहीं है। कई को तो वर्षों गुज़र गए। श्मशान भूमि के सेवकों का कहना है कि वे न तो उन्हें विसर्जित कर पा रहे हैं न ही कुछ और।






