भोपालमध्य प्रदेश

सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रामलीला उत्सव का हुआ शुभारंभ

सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रामलीला उत्सव का हुआ शुभारंभ

भोपाल यशभारत। राम मंदिर की पवित्र आभा में सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रामलीला उत्सव का शुभारंभ हुआ। यह आयोजन मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग और भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से किया गया। समारोह में अपर मुख्य सचिव, संस्कृति विभाग शिवशेखर शुक्ला ने दीप प्रज्ज्वलन कर भगवान राम सीता की आरती से विधिवत शुभारंभ किया। इस अवसर पर संस्कृति विभाग के संचालक एन.पी. नामदेव और निदेशक, जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी धर्मेंद्र पारे उपस्थित रहे।
उत्सव के पहले दिन लीला गुरुकुल संस्थान, चित्रकूट द्वारा सती संशय, दक्ष यज्ञ, सती पुनर्जन्म, शंकरपार्वती विवाह और नारद मोह प्रसंगों को रंगीन मंचन के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। इसका आलेख योगेश त्रिपाठी (रीवा), संगीत संयोजन सीताराम सिंह (पटना) और निर्देशन रामचंद्र सिंह (भोपाल) ने किया। इस लीला के गीतों को सुप्रसिद्ध भजन गायक अनूप जलोटा ने अपनी मधुर आवाज में प्रस्तुत किया।
पहले प्रसंग सती संशय में दर्शकों ने देखा कि कैसे सती ने राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप धारण किया और शिवजी के मार्गदर्शन के बावजूद भ्रम में रही। इसके बाद दक्ष यज्ञ और सती का आत्मदाह दर्शकों को भावविभोर कर गया। फिर सती का पुनर्जन्म और शंकर पार्वती विवाह का दृश्य जीवन के महत्वपूर्ण अध्याय और भक्ति का संदेश प्रस्तुत करता है। नारद मोह प्रसंग में नारद जी के प्रयास और लोकमंगल की सीख ने दर्शकों को मोहित किया।

-मुखौटे और परिधान की प्रदर्शनी आयोजित:
इसके साथ ही उत्सव में देश के विभिन्न राज्यों की रामलीला में प्रयुक्त मुकुट, मुखौटे और परिधान की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। प्रदर्शनी में पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, केरल, उत्तर प्रदेश और अन्य क्षेत्रों की कला शैलियों के प्रमुख मुखौटे और पोशाकें शामिल हैं। इसमें गोमीरा मुखौटे, छाऊ नृत्य कला के मुखौटे, चेरियाल मुखौटे, कथकली और यक्षगान में प्रयुक्त पोशाकों के साथ यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित रामनगर शैली की रामलीला के विशेष परिधान भी प्रदर्शित हैं। दर्शकों ने उत्सव और प्रदर्शनी दोनों का आनंद लिया। आयोजकों का कहना है कि इस तरह के आयोजन न केवल भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रामलीला और लोककला की महत्ता को भी उजागर करते हैं।

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