यशभारत संपादकीय….स्वास्थ मंत्री के जिले से उठी सरकारी अस्पतालों में बदहाली की आवाज..

– आशीष सोनी
प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के गृह जिले रीवा में गर्भवती महिला कल्पना मिश्रा और उसके अजन्मे बच्चे की मौत ने स्वास्थ सेवाओं के मामल में राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। महिला को 26 अगस्त की सुबह गांधी मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया और उसी दिन रात 11:55 बजे अजन्मे बच्चे सहित उसकी मौत हो गई। चिकित्सा अभिलेखों से पता चला कि उनके प्लेटलेट की संख्या लगभग 30,000 प्रति माइक्रोलीटर थी, जो सामान्य से काफी कम मानी जाती है। महिला का उच्च रक्तचाप और लिवर एंजाइमों का स्तर भी बढ़ा हुआ था। इतनी गंभीर हालत के बावजूद अस्पताल की महिला चिकित्सकों ने अमानवीय लापरवाही की। मौत के बाद हल्ला मचा तो राजधानी भोपाल तक जिम्मेदारों के पसीने छूटने लगे। फौरी एक्शन लेते हुए दो लेडी डॉक्टर समेत चार लोगों को सस्पेंड किया गया। स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला भी हरकत में आए और अपने महकमे के कलपुर्जे नए सिरे से टाइट करने की कवायद में जुट गए, पर सवाल यही है कि क्या मध्यप्रदेश में स्वास्थ सेवाओं की हालत ऐसे ही पतली रहेगी। कब तक इन अस्पतालों की शरण में आने वाले मरीजों की जान इलाज में अक्षम्य लापरवाही की वजह से जाती रहेगी। कब तलक इस हत्यारी व्यवस्था में सुधार हो पाएगा। यह सवाल प्रदेश के आम नागरिकों के जेहन में कौंध रहा है कि वे अपने इलाके के सरकारी अस्पतालों पर भरोसा करें या नहीं, या फिर निजी अस्पतालों में महंगे इलाज के नाम पर लुटते पिटते रहें।
प्रदेश के अलग अलग जिलों में हुई घटनाओं पर नजर डालें तो अकेले सीधी जिले में अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच 53 गर्भवती महिलाओं की मौत के मामले सामने आए। 2026 में सागर जिले के बांदा सिविल अस्पताल में एक बच्चे की आंखों में गलत ड्रॉप डालने से आंखों की रोशनी जाने के मामले में सरकार को नोटिस जारी किया। इससे पहले इंदौर के एमवाय अस्पताल में ऑक्सीजन आपूर्ति बाधित होने से करीब 11 मरीजों की मौत ने प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था। सिलसिला इतना बस नहीं है बल्कि महाकौशल के जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर जैसे जिलों में भी सरकारी अस्पतालों में पिछले दो सालों में अनेक मौतें हुई, जिनमें जांच के बाद इलाज में लापरवाही पाई गई। आंकड़े बताते हैं कि जुलाई 2026 कटनी जिला अस्पताल में 14 वर्षीय बालिका की इलाज के दौरान मौत के बाद परिजनों ने चिकित्सकों पर लापरवाही का आरोप लगाया तो नवंबर 2025 में रीठी के सरकारी अस्पताल में 30 वर्षीय महिला की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन को आड़े हाथ लिया। पिछले साल बरही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक महिला के पेट में 4 इंच की टूटी सुई मिलने के मामले ने भी तूल पकड़ लिया था। इसके पहले अक्टूबर 2022 में तो कटनी जिला अस्पताल में हद ही पार हो गई जहां जीवित नवजात को मृत घोषित कर दिया गया। ये मामले बताते हैं कि अस्पतालों में इलाज के नाम पर भर्राशाही, अमानवीयता और गैरजिम्मेदाराना रवैया अख्तियार किया जा रहा है। मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे जरूर कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अस्पतालों के कायाकल्प से लेकर अत्याधुनिक मशीनें लगाने और चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने तक की घोषणाएं समय-समय पर होती रही हैं लेकिन अस्पतालों के दरवाजे पर पहुंचने वाला मरीज जब घंटों इलाज के लिए भटकता है, डॉक्टर का इंतजार करता है, जांच के लिए इधर-उधर दौड़ता है या दवा के लिए बाजार जाने को मजबूर होता है, तब सरकारी दावों की चमक फीकी पड़ जाती है। आलम यह है कि कहीं डॉक्टर समय पर नहीं पहुंचते, कहीं चिकित्सक ड्यूटी से नदारद रहते हैं, कहीं नर्सिंग स्टाफ की कमी है तो कहीं जरूरी दवाओं और जांच सुविधाओं का संकट बना रहता है। यह भी ध्यान देना जरूरी है कि प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों पर काम का दबाव है, विशेषज्ञों की कमी है, ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाएं सीमित हैं। इन समस्याओं को सरकार को गंभीरता से स्वीकार करना होगा। यदि डॉक्टर और कर्मचारी निर्धारित समय पर उपस्थित नहीं हैं तो बायोमेट्रिक व्यवस्था का क्या फायदा? यदि मरीजों को शिकायत है तो शिकायत निवारण तंत्र प्रभावी क्यों नहीं है? यदि अस्पताल में दवा उपलब्ध नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की है? सरकार को अस्पतालों की निगरानी कागजों से निकालकर जमीन पर उतारनी होगी।








