
- कलेक्ट्रेट में ही व्यवस्था का दम घुटा
बदबूदार प्रसाधनों ने खोली सफाई की पोल

न टोटियां, न पानी, न सफाई; आगंतुकों के लिए पीने के पानी तक का इंतजाम नहीं, सीलन और गंदगी से बढ़ा मच्छरों का प्रकोप
कटनी,यशभारत। जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र कलेक्ट्रेट ही जब बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा हो तो सरकारी व्यवस्थाओं के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। कलेक्ट्रेट परिसर के सार्वजनिक प्रसाधनों की हालत ऐसी है कि वहां नलों में टोटियां तक नहीं हैं, पानी की व्यवस्था चौपट है और गंदगी व बदबू के बीच प्रसाधनों का उपयोग करना मुश्किल हो रहा है।
कलेक्ट्रेट परिसर में भी गंदगी का डेरा
कलेक्ट्रेट परिसर की बाहरी तस्वीर भी प्रशासनिक दावों पर सवाल खड़े कर रही है। जगह-जगह गंदगी के साथ बड़ी-बड़ी गाजर घास उग आई है, जिससे परिसर की सुंदरता पर ग्रहण लगा है। झाड़ियों और गंदगी के बीच विषैले जीव-जंतुओं का खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसे में सफाई और नियमित रखरखाव की जिम्मेदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालात सिर्फ शौचालयों तक सीमित नहीं हैं। कलेक्ट्रेट आने वाले आगंतुकों के लिए पीने के पानी तक की समुचित सुविधा नजर नहीं आती। काम से घंटों परिसर में रहने वाले लोगों को पानी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है। दूसरी ओर प्रसाधन क्षेत्रों में सीलन और गंदगी के कारण मच्छरों का प्रकोप भी बढ़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कलेक्ट्रेट में बड़ी संख्या में महिला कर्मचारी भी काम करती हैं। ऐसे में सार्वजनिक प्रसाधनों की बदहाल स्थिति उनके लिए कितनी असुविधाजनक होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। एक ओर स्वच्छता और बेहतर सुविधाओं को लेकर प्रशासन लगातार दावे करता है, दूसरी ओर अपने ही मुख्यालय में बुनियादी इंतजामों की यह तस्वीर उन दावों की हकीकत सामने ला रही है।
विडंबना देखिए—वरिष्ठ अधिकारियों के चैंबरों में निजी प्रसाधनों की सुविधा है, लेकिन कर्मचारियों और आम नागरिकों के लिए बने सार्वजनिक प्रसाधनों की सुध लेने की फुर्सत जिम्मेदारों को नहीं है। सवाल यह नहीं कि कलेक्ट्रेट में सुविधाएं क्यों खराब हैं, सवाल यह है कि जब जिले के सबसे बड़े सरकारी कार्यालय में ही सफाई और प्रसाधन व्यवस्था की ऐसी अनदेखी है तो आम सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति कितनी बदतर होगी?
अब जरूरत केवल सफाई कराने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने की है। कलेक्ट्रेट जैसे प्रमुख प्रशासनिक परिसर में यदि टोटी, पानी, स्वच्छ प्रसाधन और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी सुनिश्चित नहीं हो पा रही हैं तो संबंधित व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।







