SIR पर विवेक तन्खा की तीखी प्रतिक्रिया—‘लोकतंत्र को नष्ट होने नहीं दे सकते’

नई दिल्ली, यशभारत। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों के बीच कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। तन्खा ने मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और चुनाव आयुक्तों के बीच कथित मतभेदों से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।
तन्खा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा कि जो बातें अब तक अप्रत्यक्ष थीं, वे अब सामने आती दिख रही हैं। उन्होंने रिपोर्ट में सामने आए 13 करोड़ से अधिक नामों के ड्राफ्ट सूची से बाहर होने के आंकड़े का उल्लेख करते हुए इसके लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव पर सवाल उठाया। उन्होंने चुनाव आयुक्तों के बीच कथित असहमति का जिक्र करते हुए कहा कि अब बोलने का समय आ गया है और देश अपने लोकतंत्र को नष्ट होने की अनुमति नहीं दे सकता।
उनकी प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता नाम जोड़ने और हटाने, अपील तथा मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन खबरों के बाद स्पष्ट किया कि SIR समेत आयोग के सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से और सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग के अधिकारियों ने कहा कि अलग-अलग मुद्दों पर विचारों में अंतर हो सकता है, लेकिन इससे अंतिम निर्णय की प्रक्रिया प्रभावित नहीं हुई।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण, फॉर्म-6 में बदलाव और कुछ मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए थे। ऐसे में तन्खा की टिप्पणी ने विवाद को मतदाता अधिकार, निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की संस्थागत जवाबदेही के व्यापक मुद्दे से जोड़ दिया है। अब बहस का केंद्र मीडिया रिपोर्टों में सामने आए दावों और चुनाव आयोग के सर्वसम्मति वाले स्पष्टीकरण के बीच मौजूद दस्तावेजी तथ्यों पर है।







