जबलपुरमध्य प्रदेश

चार दिन पहले हुआ था ‘सुधार’, पहली बारिश में ही बन गया धुआंधार

मदन महल स्टेशन शेड से झरने की तरह गिरता रहा पानी, प्लेटफॉर्म हुआ लबालब

जबलपुर यशभारत। मदन महल रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 4 पर कुछ दिन पूर्व हुए सुधार कार्य की पोल पहली ही बारिश ने खोल कर रख दी। और लाखों के रखरखाव पर सवाल खड़े हो गए। शेड से झरना की तरह गिर रहे पानी को देख कर यात्रियों ने कहा- यह मरम्मत थी या महज खानापूर्ति? इस घटिया सुधार कार्य से जहां रेलवे अफसरों के दावों की कलई खुल कर सामने आ गई। वहीं बारिश में टपकती छत और पानी से भरे प्लेटफॉर्म ने यहां की व्यवस्थाओं को उजागर कर दिया। बता दें कि रेलवे ने मरम्मत के दावे तो किए थे लेकिन हल्की बारिश ने सच्चाई बता दी। जहां चार दिन पहले जिस काम का उद्घोष हुआ था उसकी उम्र पहली बरसात भी नहीं झेल सकी।

उल्लेखनीय है कि रेलवे स्टेशन यात्रियों को सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा का अनुभव देने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन मदन महल रेलवे स्टेशन पर पहली ही तेज बारिश ने व्यवस्थाओं की ऐसी तस्वीर पेश की, जिसने रेलवे प्रशासन के तमाम दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लगे सेड से झरने की तरह पानी गिरता रहा और देखते ही देखते पूरा प्लेटफॉर्म पानी से लबालब हो गया। यात्रियों को बारिश से बचाने के लिए बनाई गई छत ही उनके लिए परेशानी का कारण बन गई।सबसे हैरानी की बात यह है कि प्लेटफॉर्म की छत और सेड में रिसाव की शिकायतों के बाद महज चार दिन पहले ही सुधार और मरम्मत कार्य कराया गया था। रेलवे अधिकारियों ने व्यवस्था दुरुस्त होने का दावा भी किया था, लेकिन पहली ही बारिश में मरम्मत कार्य की गुणवत्ता की पोल खुल गई। जगह-जगह से पानी टपकने लगा और कई स्थानों पर तो हालात ऐसे बन गए मानो प्लेटफॉर्म पर कृत्रिम जलप्रपात बह रहा हो।

जानकारी के मुताबिक बारिश के दौरान प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर खड़े यात्रियों को छत के नीचे भी भीगना पड़ा। कई लोग सामान लेकर इधर-उधर सुरक्षित स्थान तलाशते नजर आए। प्लेटफॉर्म पर पानी भर जाने से फिसलन की स्थिति भी निर्मित हो गई जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगा। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक परेशान दिखाई दिए।

जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती

यात्रियों का कहना है कि रेलवे हर वर्ष मानसून से पहले रखरखाव और मरम्मत पर लाखों रुपये खर्च करने का दावा करता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। यदि चार दिन पहले किया गया सुधार कार्य पहली ही बारिश नहीं झेल पाया तो उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठना लाजिमी है। लोगों का आरोप है कि कागजों में व्यवस्थाएं दुरुस्त दिखा दी जाती हैं, जबकि वास्तविकता पहली बारिश में सामने आ जाती है।

जिम्मेदार भी सवालों के घेरे में

रेलवे के जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। यात्रियों का कहना है कि स्टेशन पर रोजाना हजारों लोगों की आवाजाही होती है, इसके बावजूद ऐसी मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है। यदि समय रहते स्थायी व्यवस्था नहीं की गई तो आने वाले मानसून में हालात और गंभीर हो सकते हैं।

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