सब्जी बेचने से लेकर माई की टेर तक के ‘राज’
एआई बनावटी, देशी वाद्ययंत्र दिलों के करीब

जबलपुर, यशभारत । माँ महाकाली एवं माँ नर्मदा के भजनों से अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले नरेन्द्र राज, आज ‘यश भारत’ प्राइम टाइम विथ आशीष शुक्ला में मदन गोपाल गर्ग से रूबरू हुए। उन्होंने अपने पिता के साथ सब्जी बेचने व फोटोग्राफी करने से लेकर भक्तिगीत गायकी तक के सफर के राज खोले। वे कहते हैं कि AI बनावटी है जबकि ढोल-मंजीरा, मृदंग दिल के करीब, उसमें संगीत की आत्मा बसती है।नरेन्द्र राज अपने राज खोलते हुए बताते हैं कि उनके पिता सब्जी बेचा करते थे, तब उन्हें भी कई बार उनके साथ होना पड़ता था। तब लगाई टेर अब माँ के द्वार पर लगाने वाली टेर में बदल चुकी है। जिंदगी
के सफर में उन्होंने लंबे समय तक फोटोग्राफी की। जिस कारण देर रात लौटने पर माँ को जगाना अच्छा नहीं लगता था तो वे मंदिर में भजन गीत, गायकों के बीच बैठ जाते जहाँ से माँ के प्रति लगन जगी, जो आज तक जारी है।

बड़ी महाकाली, गढ़ाफ्फटक वाली-नरेन्द्र जी अपने राज खोलते हुए बताते हैं कि बचपन में वे नरेंद्र चंचल व लखबीर सिंह लक्खा जी के भजन सुना करते थे, जो उनके लिये गुरु-तुल्य हैं। भजन सुनते-सुनते एक दिन उन्होंने अपना पहला भजन बड़ी महाकाली, गढ़ाफाटक वाली…, कैसेट में रिलीज कर दिया। जिसे हैं।
शहर व आसपास असीम प्यार मिला। फिर क्या था, एक के बाद एक कार्यक्रम व भजन मिलते गये और ख्याति बढ़ती गई। माँ नर्मदा का भी आशीर्वाद मिला- भजन गायक नरेन्द्र राज बताते हैं कि माँ नर्मदा कई शहरों से गुजरती हैं, लेकिन जैसी भक्ति जबलपुर वाले करते हैं, वैसी कोई नहीं। जिसे देखकर ही अपनी धुन में गीत उपजा ‘माई के दीवाने, जबलपुर वाले, रेवा माई के…’ जिसे बेहद ख्याति मिली। जिसके बाद एक के बाद एक भजन आये, और हिट हुए। वे नित्यप्रति माँ नर्मदा के दर्शन करना पसंद करते
सिंधी, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी भाषाओं में भी गायन – नरेन्द्र जी
मूलतः बुंदेली गायक हैं। उनकी गायकी में बुंदेली गायकी की सुगंध बसती है, लेकिन वे सिंधी, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी आदि भाषाओं में भी गीत गाते हैं। 25 वर्षों के गायकी सफर में उन्होंने कई राज्यों में अपने कार्यक्रम दिये। ‘लटक-मटक चली आई रे भवानी’, ‘खेल रही मोरी शारदा भवानी…’, ‘बोल बम का नारा है, महाकाल हमारा है…’, ‘ऊंचे अटा पर बैठी शारदा भवानी..’ उनके प्रसिद्ध भजनों में से हैं।
AI बनावटी, आत्मा का अभाव भजनों की दुनिया में AI
के आगमन पर नरेन्द्र राज ‘जबलपुर वाले’ कहते हैं कि AI में बनावटीपन है। इसमें आत्मा नहीं। ढोल, मृदंग, मंजीरा आदि वाद्ययंत्र दिल के करीब हैं। जब वे बजते हैं तो दिल को मोह लेते हैं। बुंदेली भाषा लोकगीत व संगीत की जान है जिसका कोई मुकाबला नहीं है।







