रील पॉलिटिक्स का बोलबाला : कैंपस से गायब होते असली छात्र नेता, अब मुद्दों पर नहीं, मोबाइल कैमरे पर चल रही है छात्र राजनीति!

जबलपुर यशभारत। कभी छात्र राजनीति समाज की दिशा और दशा तय करने का पहला पड़ाव हुआ करती थी। इसी शहर ने शरद यादव, रामेश्वर नीखरा, मदन तिवारी, वृंदावन दुबे, भानु जैन, हरि नारायण भट्टर, डॉ आर एस शुक्ला, राजकुमार शुक्ला, चंदू चौबे, रत्नेश सालोमन, निर्मल चंसौरिया, प्रहलाद पटेल, अजय बिश्नोई, लखन घनघोरिया, राकेश सिंह, आलोक मिश्रा, तिलक यादव, दिलीप यादव, भगवानदास यादव, गोविंद यादव, रमेश चौधरी जैसे छात्र नेता दिए जिनकी एक ललकार से पूरा विश्वविद्यालय कैंपस थर्रा जाता था। न केवल छात्र नेता बल्कि महिला महाविद्यालयों में राजनीति करने वालों में नर्मदा पाठक, शशि जैन, मल्लिका बनर्जी के नाम भी शामिल रहे हैं जिनकी तूती बोलती थी। पहले न केवल छात्रों से जुड़े मुद्दे उठाये जाते थे बल्कि छात्र राजनीति करने वाले जनता से जुड़े मुद्दों पर भी प्रभावी भूमिका निभाते थे लेकिन वर्तमान राजनीति में यह सब देखने नहीं मिल रहा। पूर्व में छात्रों से जुड़े मुद्दे उठाए जाते थे, संघर्ष होता था, आंदोलन की अनुभूति होती थी और नेता छात्रों की नब्ज पकड़कर आगे बढ़ते थे।लेकिन अब तस्वीर उलट चुकी है।आज के “छात्र नेता” संघर्ष कम, स्टोरी–रील ज्यादा बना रहे हैं।जमीन पर मुद्दे गायब, पर सोशल मीडिया पर “एक्टिव” दिखने की होड़ जारी है।
एबीवीपी : व्यक्तिगत व्यवहार ने शांत कर दी आक्रामकता
कभी एबीवीपी के कार्यकर्ता आंदोलन, धरना, प्रतीकात्मक प्रदर्शन में सबसे आगे दिखते थे।आज हालात यह हैं कि संगठन के भीतर ही कुछ चेहरों का व्यक्तिगत व्यवहार इतना विवादास्पद हो गया है कि पूरी इकाई शांत और ठंडी पड़ती दिखाई देती है। नेतृत्व की चमक फीकी और कार्यकर्ताओं का जोश सोशल मीडिया पोस्टों में सिमट गया है।
एनएसयूआई : मुकदमों के डर से पोस्टर तक लगाने में हिचक
एनएसयूआई की स्थिति और भी दिलचस्प है मुकदमों के डर से छात्र नेता विरोध करना तो दूर, पोस्टर-बैनर लगाने से पहले भी 3 बार सोच रहे हैं।कैंपस की राजनीति मैदान से हटकर “व्हाट्सऐप ग्रुप डिबेट” तक सीमित हो चुकी है।
कैंपस में आंदोलन नहीं, रील की शूटिंग
जहां पहले कैंपस में नारे लगते थे, आज वहीं ‘रील शूट चल रही है भाई, साउंड मत करो!’ की आवाज गूंजती है।पूर्व नेताओं की छवि मजबूत थी.आज के नेता फ़ोन कैमरे में एंग्री लुक देकर खुद को “फायरब्रांड” साबित करने में व्यस्त हैं।
गायब हो रही असली छात्र राजनीति
शहर ने एक समय ऐसे नेता देखे जो सड़क पर उतरते थे, संघर्ष करते थे और आगे चलकर बड़े पदों पर पहुंचे।लेकिन वर्तमान दौर में छात्र राजनीति की रीढ़ कमजोर पड़ती दिख रही है।
युवा नेतृत्व सोशल मीडिया की चमक में खो चुका है और असली मुद्दे लाइक—कमेंट के बीच दम तोड़ रहे हैं।कभी नेता एक आवाज में भीड़ जुटा लेते थे,अब 10 सेकेंड की रील में फॉलोअर्स जुटाने की जद्दोजहद में असली नेतृत्व गायब होता जा रहा है।







