भारतीय संस्कृति की रंगीन पहचान रंगोली से जगमगाए आंगन

भारतीय संस्कृति की रंगीन पहचान रंगोली से जगमगाए आंगन
संकेत नाईक, भोपाल। भारतीय परंपरा में त्यौहारों व शुभ अवसरों पर दरवाज़ों के बाहर सजी रंगोली न केवल सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि यह हमारी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आस्था को भी अभिव्यक्त करती है। दीपावली का मौसम आते ही बाजारों से लेकर घरों तक रंगों की यह कला माहौल को और अधिक उत्सवमय बना देती है। माना जाता है कि रंगोली घर में सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और खुशहाली का आगमन कराती है।

भारत के विभिन्न राज्यों में रंगोली की शैली बदल जाती है, लेकिन उसका भाव एक ही रहता है। कहीं इसे अल्पना, कहीं कोलम, तो कहीं मुग्गु या मंडना के नाम से जाना जाता है। दक्षिण भारत में आटे से बनाई जाने वाली कोलम रोज सुबह घर के आंगन को पवित्र करती है, वहीं मध्यप्रदेश और राजस्थान में मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से सजाए गए मंडनों का प्रचलन है। रंगोली का उल्लेख प्राचीन पुराणों एवं लोककथाओं में भी मिलता है, जहां देवी-देवताओं के स्वागत के लिए इसे शुभ प्रतीक माना गया है।
त्योहारी समय में रंगोली की रौनक और भी बढ़ जाती है। दीपावली, ओणम, पोंगल या संक्रांति जैसे पर्व रंगोली के बिना अधूरे माने जाते हैं। पहले के समय में घरों में चावल का आटा, हल्दी, रोली और फूलों की पंखुडय़िों से रंगोली बनाई जाती थी, जबकि आजकल रंग-बिरंगे पाउडर, स्टेंसिल और ग्लिटर का भी प्रयोग किया जा रहा है। बदलते समय के साथ इसकी शैली आधुनिक जरूर हुई है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी उतनी ही पारंपरिक और पवित्र है। दशमेश नगर निवासी रंगोली एक्सपर्ट कशिश चौहान ने बताया कि रंगोली केवल साज-सज्जा नहीं, बल्कि भावनाओं की भी भाषा है। हर रंग का अपना प्रतीक है लाल रंग जोश और शुभता का, नीला शांति का, हरा समृद्धि का और पीला उम्मीद का द्योतक माना जाता है। कई परिवारों में संयुक्त रूप से बैठकर रंगोली बनाने की परंपरा पीढिय़ों से चलती आ रही है, जो समाज में रचनात्मकता के साथ एकता का संदेश भी देती है।
त्यौहारों की इस खुशियों भरी रंगोली उस मुस्कान का रूप है, जो बिना कुछ कहे भी घर के वातावरण को प्रसन्नता से भर देती है। परंपरा और सादगी भरी यह सुंदर कला आज भी हर चौखट को अपनी रंगीन छटा से सुशोभित कर रही है क्योंकि सच ही कहा जाता है, जहां रंगोली होती है, वहां मुस्कान अपने आप चली आती है।







