66 की बजाय 94 विधानसभा सीटों को फायदा पहुंचा सकते राहुल!
मालवा निमाड़ की बजाय महाकोशल-बुंदेलखंड में छात्रों की गूंज से बदल सकते समीकरण

(आशीष सोनी)
भोपाल, यशभारत। लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आगामी 12 सितम्बर को छात्रों की गूंज कार्यक्रम के जरिए इंदौर के नेहरू स्टेडियम में 50 हजार से ज्यादा छात्रों से संवाद करने वाले हैं। कार्यक्रम की तैयारियों के लिए दिल्ली की एक टीम इंदौर में डेरा डाल चुकी है, लेकिन कांग्रेस के गलियारों में बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी का कार्यक्रम मालवा निमाड़ की बजाय महाकोशल, बुंदेलखंड और विंध्य के बीच कहीं पर आयोजित किया जाता तो तुलनात्मक रूप से पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होता।
मध्यप्रदेश विधानसभा की 230 सीटें हैं और इस इलाके में 94 सीटें आती हैं, जबकि मालवा निमाड़ में 66 सीटें शामिल हैं। कांग्रेस के रणनीतिकार यदि छात्रों से संवाद के लिए महाकौशल को चुनते तो चुनावी दृष्टिकोण से कांग्रेस को इस इलाके में बड़ी संजीवनी मिलती।
2029 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले 2028 में होने वाले एमपी के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछाने के लिए कांग्रेस पूरी तरह एक्टिव मोड पर आ चुकी है। पूरे देश में जेन जी से संवाद के कार्यक्रम चलाकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी युवाओं के बीच न केवल अपने विचारों पर सहमति की मुहर लगवाने, बल्कि देश में बदलाव का एक नैरेटिव भी सेट करने की कोशिश में हैं।
छात्रों से गूंज कार्यक्रम को कांग्रेस अपना राजनीतिक एजेंडा मानने से साफ इनकार करती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी इसे सीधे तौर पर कांग्रेस का सियासी दांव मान रही है। जंतर-मंतर पर जेन जी के मूवमेंट के बाद जिस तरह शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा, उसके बाद से भाजपा बैकफुट पर आ चुकी है। ऐसे में राहुल गांधी की छात्रों और युवाओं के बीच सक्रियता ने भाजपा के रणनीतिकारों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।
देश के अनेक हिस्सों में संवाद कार्यक्रमों में पहुंच रही छात्रों की भीड़ कहीं सत्ता में बदलाव की बयार लेकर न आ जाए, इस खतरे को भांपकर भाजपा चौकन्नी है। राहुल ने अब मध्यप्रदेश की ओर रुख किया है। जाहिर है उनकी टीम के जेहन में 2028 में होने वाले एमपी के विधानसभा चुनाव का सीक्रेट प्लान होगा। इस स्थिति में टीम राहुल को एमपी की कुल सीटों को ध्यान में रखते हुए छात्रों के गूंज कार्यक्रम के लिए ऐसे स्थान का चयन करना था, जहां से निकलने वाली आवाज की पहुंच ज्यादा से ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों तक हो।
इसके लिए महाकौशल, बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र सबसे उपयुक्त था। इस इलाके में महाकौशल की 38, विंध्य की 30 और बुंदेलखंड की 26 सीटें आती हैं। इस तरह 94 सीटों के बड़े क्षेत्र को राहुल अपने संवाद से लाभ पहुंचा सकते थे। इसके अलावा हर विधानसभा से छात्र संवाद में पहुंचते तो एक माहौल भी बनता।
सवाल यही है कि 94 सीटों के बड़े इलाके की बजाय 66 सीटों वाले मालवा निमाड़ को चुनकर कांग्रेस ने कोई रणनीतिक चूक तो नहीं की? यशभारत से बातचीत में प्रदेश के दिग्गज कांग्रेस नेता मानते हैं कि अगर महाकौशल में संवाद कार्यक्रम होता तो 2028 में पार्टी के लिए एक सकारात्मक माहौल बनता। इंदौर में इसके पहले भी कांग्रेस बड़े कार्यक्रम आयोजित कर चुकी है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो भाजपा का इस इलाके में वर्चस्व अधिक है। कांग्रेस को राहुल की अगुवाई में यहां पैठ बनाने का मौका मिलता। गौरतलब है कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य देश और प्रदेश के युवाओं से जुड़ना और उनकी आकांक्षाओं को समझना है। कार्यक्रम के दौरान प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, उच्च शिक्षा की महंगी फीस और बेरोजगारी जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा होगी।
कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि शुरुआत में इस कार्यक्रम के लिए जबलपुर पर विचार किया गया था, लेकिन इंदौर को राज्य का प्रमुख शैक्षणिक केंद्र होने के कारण अंतिम रूप से चुना गया। हालांकि जबलपुर भी उच्च शिक्षा का बड़ा केंद्र है। बहरहाल, पार्टी इस बड़े आयोजन के जरिए मध्यप्रदेश के युवाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने और संगठन में नई ऊर्जा भरने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस भी कर रही महाकौशल की उपेक्षा?
बड़ा सवाल यह भी है कि क्या प्रदेश और केंद्र सरकार की तरह कांग्रेस भी महाकौशल की उपेक्षा कर रही है। राहुल गांधी को महाकौशल के केंद्र बिंदु जबलपुर लाकर पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर इस क्षेत्र के महत्व को रेखांकित कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार द्वारा नियति की संभावनाओं को बढ़ावा देने एमपी के 5 जिलों में एक्सपोर्ट सेंटर बनाए जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। लेकिन इसमें जबलपुर शामिल नहीं है।
मेडिकल यूनिवर्सिटी पर भी विभाजन की तलवार लटक रही है, जबकि टेलीकॉम फैक्ट्री की भूमि एवं औद्योगिक अधोसंरचना का उपयोग शहर के तकनीकी एवं औद्योगिक विकास में किया जा सकता है। क्या यह जबलपुर को आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर करने की साजिश नहीं? कांग्रेस को भी इन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।








