जबलपुर की तासीर: जब वैचारिक मतभेद भूल ओशो की मदद को आगे आए थे महर्षि महेश योगी
आशीष शुक्ला

यश भारत, जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर की तासीर ही कुछ ऐसी है कि यहां विपरीत विचारधाराएं भी संकट के समय एक धरातल पर खड़ी होती हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आध्यात्मिक जगत की दो महान विभूतियों-आचार्य रजनीश (ओशो) और महर्षि महेश योगी-के जीवन से जुड़ा वह ऐतिहासिक प्रसंग है, जिसका हाल ही में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी ने उल्लेख किया। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
दोनों ही महान आत्माओं ने अपने जीवन का एक लंबा और महत्वपूर्ण कालखंड जबलपुर में बिताया था। जहां एक ओर ओशो की तार्किक और लीक से हटकर बात करने थे जो सांसारिकता से दूर होकर जीवन को एक उत्सव के रूप में लेते थे और वे एक विरोधी व आलोचना केंद्रित बात करते थे। वहीं महर्षि महेश योगी भावातीत ध्यान के माध्यम से संयम और समझाइश का मार्ग दिखाते थे।
वैचारिक रूप से दोनों परस्पर विरोधी ध्रुव थे। श्री श्री रविशंकर जी ने एक सूत्र के दौरान इस बात का खुलासा करते हुए कहा था- ओशो और महर्षि महेश योगी दोनों जबलपुर से थे। ओशो अक्सर महर्षि जी की आलोचना करते थे। लेकिन जब अमेरिका में ओशो पर भारी जुर्माना लगा और कानूनी संकटों के चलते वे आर्थिक देनदारी में फंसे, तब महर्षि महेश योगी ने बिना किसी झिझक के उनकी वित्तीय सहायता की थी।
श्री श्री रविशंकर के द्वारा उक्त जानकारी महर्षि महेश योगी की जयंती पर 12 जनवरी को बेंगलुरु आश्रम में आयोजित एक समारोह के दौरान दी गई, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। यह घटना दर्शाती है कि जबलपुर की यह माटी केवल विचार-विमर्श की भूमि नहीं, बल्कि संकट के समय बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे का हाथ थामने का संस्कार भी देती है। संस्कारधानी के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है कि यहां की माटी ने विश्व को सहिष्णुता और आपसी सद्भाव का ऐसा अनुपम उदाहरण दिया है।







