Top-5देशमुख्य ख़बरें

वन नेशन, वन इलेक्शन: JPC और सुप्रीम कोर्ट बैठक विवाद, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति-संतुलन पर उठा सवाल

यश भारत ,नई दिल्ली: देश में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ लागू करने की दिशा में गठित संसद की संयुक्त समिति (JPC) और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच होने वाली प्रस्तावित बैठक रद्द होने के बाद विवाद ने बड़ा संवैधानिक रूप ले लिया है। समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर को बैठक के लिए सहमति दी थी, लेकिन 1 अक्टूबर को उठती आपत्तियों के बीच इसे निरस्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ न्यायाधीशों के परामर्श के बाद यह महसूस किया गया कि संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानून भविष्य में न्यायिक समीक्षा के लिए अदालत के पास आ सकते हैं, इसलिए ऐसे विषयों पर पहले से चर्चा करना उचित नहीं होगा।

विवेक तन्खा का बड़ा हमला: JPC की पहल वैचारिक रूप से गलत

राज्यसभा सांसद और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने इस घटनाक्रम पर अपनी बेबाक राय रखते हुए कहा कि JPC की यह पहल अवधारणात्मक रूप से पूरी तरह गलत थी। उन्होंने कहा कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ एक घोर राजनीतिक और विवादित विषय है। ऐसे मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और न्यायाधीशों को शामिल करने की कोशिश से न्यायपालिका के लिए असहज स्थिति पैदा हुई है।

पूर्व की बैठकें बनाम वर्तमान विवाद

अतीत के 3 प्रमुख विषय: पूर्व में संसदीय समितियों ने वर्चुअल कोर्ट्स , मध्यस्थता विधेयक और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण जैसे मुद्दों पर न्यायाधीशों के साथ परामर्श किया था।

प्रकृति में अंतर: तन्खा के अनुसार, ये तीनों विषय न्याय प्रणाली को सुचारू बनाने, मुकदमों के बोझ को कम करने और आम जनता को सस्ता न्याय दिलाने से जुड़े तटस्थ व गैर-राजनीतिक विषय थे।

वर्तमान मुद्दा: ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ सीधे तौर पर देश के राजनीतिक ढांचे, चुनावी प्रक्रिया और राज्यों के अधिकारों से जुड़ा अत्यधिक संवेदनशील राजनीतिक विषय है। इसकी तुलना पिछले प्रशासनिक सुधारों से करना पूरी तरह अनुचित है।

संसदीय समिति के भीतर उभरे दो फाड़

समिति के भीतर भी इस बैठक को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। द्रमुक (DMK) सांसद व वरिष्ठ वकील पी. विल्सन ने अतीत के उदाहरणों का हवाला देते हुए जजों से अनौपचारिक राय लेने का समर्थन किया था। वहीं, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इसे “बड़ी गलती” करार देते हुए कहा कि जो कानून भविष्य में अदालत के समक्ष समीक्षा के लिए आना है, उस पर जजों की सलाह लेना असंवैधानिक परंपरा की शुरुआत होती।

क्यों टली ऐतिहासिक बैठक

न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत: यदि जज कानून बनने से पहले अपनी राय व्यक्त कर देंगे, तो बाद में उसी कानून की संवैधानिक वैधता पर वे निष्पक्ष सुनवाई नहीं कर पाएंगे।

शक्ति पृथक्करण : संविधान के अनुसार कानून बनाना विधायिका का काम है और उसकी जांच करना न्यायपालिका का। दोनों के बीच यह दूरी बनी रहना आवश्यक है।

सार्वजनिक विरोध: वरिष्ठ वकीलों और विपक्षी सांसदों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे “असंवैधानिक” बताने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बैठक रद्द करने का फैसला लिया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button