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मेरा यादगार केस: हाईवे का वो नरपिशाच और खाकी का विद्वान

मेरा यादगार केस: हाईवे का वो नरपिशाच और खाकी का विद्वान

 जब 34 लाशों के गुनहगार का काल बने एसपी दिनेश कुमार कौशल

देश के सबसे खूंखार सीरियल किलर आदेश खामरा के अंत की पूरी दास्तान

भोपाल, यश भारत। मध्य प्रदेश पुलिस के 1998 बैच के जांबाज अधिकारी दिनेश कुमार कौशल की कहानी किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। छतरपुर की गलियों से शुरू हुआ सफर आज सागर की विशेष शाखा में पुलिस अधीक्षक के पद तक पहुँच चुका है। वे न केवल एक निडर अफसर हैं, बल्कि देश के इकलौते ऐसे पुलिस कप्तान भी हैं जिनके पास डॉक्टर ऑफ लेटर्स की प्रतिष्ठित उपाधि है। राष्ट्रपति वीरता पदक से सम्मानित कौशल ने हाल ही में अपने करियर के सबसे सनसनीखेज आदेश खामरा केस के उन पन्नों को पलटा, जिन्हें पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

सवाल: आदेश खामरा केस की वो शुरुआत कैसे हुई, जिसने भारतीय अपराध जगत को दहला दिया?

जवाब: यह साल 2018 की बात है, जब मैं भोपाल में एएसपी था। बिलखिरिया इलाके में एक ट्रक चालक की लाश मिली और सरिया से लदा ट्रक गायब था। यह एक ब्लाइंड मर्डर था, जिसमें कोई चश्मदीद नहीं था। जांच के दौरान हमने एक संदिग्ध को पकड़ा, जिसने इस खूंखार नेटवर्क का राज खोला। पता चला कि एक ऐसा गिरोह सक्रिय है जो ट्रक ड्राइवरों को खाने या चाय में नींद की दवा देकर बेसुध करता है और फिर बड़ी बेरहमी से उनकी हत्या कर देता है।

सवाल: आरोपी को पकड़ना कितना चुनौतीपूर्ण था?

जवाब: गिरोह का मास्टरमाइंड आदेश खामरा बेहद शातिर था। उसकी गिरिफ्तारी हेतु हमारी टीम ने उसका पीछा किया और सुराग मिला, जिसके बाद हमने एक विशेष रणनीति बनाई और उसे घेराबंदी कर दबोचा। वह सोच भी नहीं सकता था कि मध्य प्रदेश पुलिस उसे वहां से उठा लेगी। सफलता हासिल करने के बाद जब पूछताछ शुरू हुई, तो जो सच निकला उसने हमारी रूह कंपा दी उसने एक-एक कर 34 हत्याओं का राज उगला।

सवाल: आपके सीने पर वीरता के कई पदक चमकते हैं, उनके पीछे की कहानी क्या है?

जवाब: दतिया में पदस्थापना के दौरान 50 से अधिक अपराध करने वाले डकैतों से हुई आमने-सामने की मुठभेड़ में अदम्य साहस दिखाने पर मुझे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साहब ने वीरता पदक’ दिया। वहीं, ग्वालियर में सांप्रदायिक तनाव को मात्र 2 घंटे में शांत करने पर मुझे ‘रुस्तम अवार्ड’ मिला। ये सम्मान दरअसल पूरी टीम की मेहनत का नतीजा होते हैं।

सवाल: पुलिस की कठिन ड्यूटी के बीच आपने डॉक्टर ऑफ लेटर्स जैसी बड़ी मुकाम कैसे हासिल की?

जवाब: मेरा बचपन छतरपुर में बहुत ही साधारण बीता। पढ़ाई का शौक मुझे शुरू से था। पुलिस सेवा के दौरान ही मैंने पीएचडी और फिर सर्वोच्च उपाधि डॉक्टर ऑफ लेटर्स हासिल की। मेरा मानना है कि शिक्षा इंसान को और अधिक संवेदनशील और तार्किक बनाती है, जिससे जटिल अपराधों को सुलझाने में मदद मिलती है।

सवाल: युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?

जवाब: पुलिस जनता के सहयोग के बिना कुछ भी नहीं है। युवाओं से बस यही कहूँगा कि वर्दी केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि समाज की सेवा करने और आत्म-संतुष्टि पाने का सबसे बेहतरीन जरिया है। लगातार जनता से संवाद करें और उनके सुख-दुख में शामिल होकर उनका सहयोग लें।

इंटरव्यू की खास बात:

अपराधी कितना भी शातिर हो, वो सुराग छोड़ता ही है। बिलखिरिया का वो एक सुराग उसको गिरिफ़्तारी तक ले गया और 34 बेगुनाहों के हत्यारे को सलाखों के पीछे तक पहुँचा दिया गया।

दिनेश कुमार कौशल (एसपी, विशेष शाखा)

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