रंग भेद और दहेज पर करारा प्रहार गुड़िया की शादी ने दर्शकों को किया भावुक स्मरण हबीब रंग आलाप के दूसरे दिन बुंदेलखंडी परिवेश में सामाजिक कुरीतियों का सशक्त मंचन

रंग भेद और दहेज पर करारा प्रहार गुड़िया की शादी ने दर्शकों को किया भावुक
स्मरण हबीब रंग आलाप के दूसरे दिन बुंदेलखंडी परिवेश में सामाजिक कुरीतियों का सशक्त मंचन
भोपाल यश भारत। हम थियेटर ग्रुप द्वारा रवींद्र भवन में आयोजित 22वें स्मरण हबीब रंग आलाप नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन समता सागर लिखित एवं संजय श्रीवास्तव निर्देशित नाटक गुड़िया की शादी का प्रभाव शाली मंचन किया गया। बुंदेलखंडी कस्बे की पृष्ठभूमि पर आधारित इस नाटक ने रंग भेद दहेज प्रथा और बेटियों को बोझ समझने जैसी सामाजिक कुरीतियों पर संवेदनशील और सार्थक प्रश्न खड़े किए। नाटक की कहानी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की सांवले रंग की बेटी गुड़िया के इर्द गिर्द घूमती है जिसे अपने रंग को लेकर घर और समाज से लगातार ताने सुनने पड़ते हैं। इसके बावजूद गुड़िया जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखती है। उसकी सहजता और निर्मल सोच विपरीत परिस्थितियों में भी उसे टूटने नहीं देती। गुड़िया की शादी तय होने के बाद घर में खुशियों का माहौल होता है लेकिन विवाह से एक दिन पहले हुई एक अप्रत्याशित घटना से उसकी सूरत और बिगड़ जाती है। पूरा परिवार चिंता में डूब जाता है कि अब शादी कैसे होगी। ऐसे समय में उसकी भाभी संकटमोचक बनकर सामने आती है जो स्वयं सामाजिक पूर्वाग्रहों का शिकार रही है। निर्देशक संजय श्रीवास्तव ने गुड़िया को केवल पीड़ित पात्र के रूप में प्रस्तुत नहीं किया बल्कि उसकी सरल बातों में जीवन दर्शन की गहरी अनुभूति भी दिखाई। नाटक ने बिना किसी उपदेशात्मक शैली के दहेज सुंदरता के सामाजिक पैमानों और लड़की पराया धन जैसी मानसिकताओं पर प्रभावी चोट की। गुड़िया की भूमिका में प्रीति बिरहा ने अपनी सशक्त अभिनय क्षमता से दर्शकों का दिल जीत लिया। वहीं भाभी के किरदार में एकता चौरसिया ने ममता और विद्रोह का संतुलित चित्रण किया। बुंदेलखंडी बोली, घरेलू परिवेश और जीवंत मंच सज्जा ने प्रस्तुति को वास्तविकता के बेहद करीब ला खड़ा किया। नाटक का सबसे मार्मिक संदेश यह रहा कि सुंदरता बाहरी रंग में नहीं बल्कि मन की उज्ज्वलता में बसती है। गुड़िया का संवाद रंग काला सही मन तो उजला है







