प्रतिष्ठित कायाकल्प अवार्ड तो मिला पर नियमित डॉक्टर नहीं
संजय नगर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बुरे हाल

जबलपुर यशभारत। मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में स्वास्थ्य सेवाओं की एक अजीबोगरीब तस्वीर सामने आई है। शहर के संजय नगर स्थित आयुष्मान आरोग्य मंदिर शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जिसे वर्ष 2023-24 के लिए प्रतिष्ठित कायाकल्प अवार्ड से सम्मानित किया गया है, वहाँ पिछले करीब एक साल से नियमित डॉक्टर का पद खाली पड़ा है। यह स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत और सम्मान के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
कायाकल्प अवार्डरू चमक के पीछे की काली सच्चाई
कायाकल्प अवार्ड उन स्वास्थ्य केंद्रों को दिया जाता है जो स्वच्छता, संक्रमण नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन और मरीजों को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने में उत्कृष्टता हासिल करते हैं। ऐसे में यह बेहद चौंकाने वाला है कि जिस केंद्र को यह सम्मान मिला है, वह मरीजों को सबसे बुनियादी सुविधा, यानी एक स्थायी चिकित्सक, प्रदान करने में विफल है। यह दर्शाता है कि अवार्ड प्रक्रिया में कहीं न कहीं खामी है, या फिर अवार्ड केवल दिखावे तक सीमित रह गया है, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
डॉक्टर नहीं तो कौन देखेगा मरीज?
स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर की अनुपस्थिति का सीधा खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। इलाज की उम्मीद से आने वाले लोग मजबूरन स्टाफ के भरोसे प्राथमिक उपचार ले रहे हैं। स्टाफ मरीजों की ब्लड प्रेशर (बीपी) और पैथोलॉजी जांचें कर रहा है और उन्हें कुछ दवाइयां भी दे रहा है, लेकिन गंभीर या विस्तृत इलाज के लिए मरीजों को सीधे जिला अस्पताल या अन्य बड़े अस्पतालों में जाने की सलाह दी जा रही है। ऐसे में, यह केंद्र एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की बजाय केवल एक श्रेफरल सेंटरश् बनकर रह गया है।
मरीजों की जुबानीरू ष्डॉक्टर नहीं हैं, कहीं और जाओ!ष्
मरीजों का दर्द साफ झलकता है। अधारताल निवासी अशोक पाल ने बताया कि वे अपने पिता के इलाज के लिए इस केंद्र पर आए, लेकिन उन्हें बताया गया कि डॉक्टर नहीं हैं और विक्टोरिया अस्पताल जाने की सलाह दी गई। शोभापुर क्षेत्र के शुभांशु पासी का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा। अपनी बीमार मां को लेकर पहुंचे शुभांशु को स्टाफ ने डॉक्टर न होने की बात कहकर रांझी या जिला अस्पताल जाने को कह दिया। मरीजों का यह साझा अनुभव बताता है कि उन्हें इस अवार्ड प्राप्त केंद्र से केवल एक ही सलाह मिलती हैरू ष्डॉक्टर नहीं हैं, कहीं और जाओ!ष् यह स्थिति उन लोगों के लिए और भी मुश्किल है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और तुरंत चिकित्सा सहायता के लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर हैं।
अधिकारियों की स्वीकारोक्ति और बेबसी
इस गंभीर स्थिति पर अर्बन नोडल अधिकारी डॉ. एसएस दाहिया ने खुलकर स्वीकार किया कि पिछले एक साल से ओपीडी में डॉक्टर का पद खाली है। उन्होंने यह भी बताया कि पास के ही स्वास्थ्य केंद्र से सप्ताह में सिर्फ एक दिन के लिए एक डॉक्टर की ड्यूटी लगाई गई है, जो स्पष्ट रूप से नाकाफी है। डॉ. दाहिया ने बताया कि इस महत्वपूर्ण पद को भरने के लिए शासन को पत्र लिखा जा चुका है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। यह अधिकारियों की स्वीकारोक्ति तो है, लेकिन समाधान की दिशा में धीमी प्रगति उनकी बेबसी को भी दर्शाती है।
कायाकल्प अवार्डरू क्या यह सिर्फ एक ढोंग?
इस पूरे प्रकरण से यह सवाल उठता है कि क्या कायाकल्प अवार्ड जैसी पहलें केवल कागजों पर और दिखावे के लिए हैं, या उनका वास्तविक उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाना है? जब एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जिसे एक बड़े सम्मान से नवाजा गया है, डॉक्टर जैसे मूलभूत आवश्यकता के बिना चल रहा है, तो यह स्पष्ट है कि कहीं न कहीं मूल्यांकन प्रक्रिया में कमी है। मरीजों को बेहतर इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है, जिससे न केवल उनकी परेशानी बढ़ रही है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर उनका विश्वास भी कम हो रहा है। यह स्थिति स्वास्थ्य विभाग को अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित करती है कि अवार्ड केवल दिखावा न बनें, बल्कि जमीनी हकीकत को भी दर्शाएं।







