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भाजपा की अंदरूनी राजनीति,चार ब्राह्मण नेताओं ने ठोकी महामंत्री पद पर दावेदारी

लंबे समय से अटकी महानगर की कार्यकारिणी, नहीं बन रहा सामंजस्य

जबलपुर, यश भारत। गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ जहां प्रदेश की कार्यकारिणी घोषित कर दी है वहीं दूसरी तरफ दो दर्जन जिलों की कार्यकारिणी अटकी हुई है। उसमें जबलपुर का भी नाम शामिल है। जानकारी के मुताबिक जबलपुर में महामंत्री पद को लेकर पेंच फंसा हुआ है, जिसमें चार नाम को लेकर मामला अटका हुआ है। सबसे खास बात तो यह है कि चारों ब्राह्मण चेहरे हैं जिसमें तीन पुरुष और एक महिला का नाम है जिसको लेकर सहमति नहीं बन पा रही है और कार्यकारिणी फाइनल नहीं हुई है, वहीं ग्रामीण की कार्यकारिणी घोषित हुए एक महीने का समय बीत गया है।

यहां फंसा है दो नामों पर पेच

महामंत्री पद को लेकर उत्तर मध्य विधानसभा सीट से दो नाम सामने आ रहे हैं जिसमें एक नाम तो क्षेत्रीय विधायक की पसंद मानी जा रही है , हालांकि कुछ समय पहले तक उक्त चेहरा पनागर विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय रहता था, अब उत्तर मध्य विधायक के करीबी है। वहीं दूसरा नाम रहता तो उत्तर मध्य विधानसभा में है लेकिन कोटा पश्चिम विधानसभा से लग रहा है। उक्त नाम विधानसभा का प्रतिनिधित्व करने वालो का चहेता है ।दोनों ही नेता महामंत्री पद को लेकर जोर लगाए हुए हैं ।

यहां के अलग ही समीकरण

वहीं शेष दो नाम कैंट विधानसभा सीट और पश्चिम विधानसभा सीट से आते हैं लेकिन दोनों ही चेहरे क्षेत्रीय विधायकों की प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं है, लेकिन वह भी अपने स्तर पर महामंत्री पद के लिए प्रयास कर रहे हैं। एक तरफ जहां कैंट से एक पुराना नाम है जो निगम से लेकर संगठन तक की राजनीति कर चुका है और चुनाव के समय टिकट की दौड़ में भी शामिल हो जाया करता है। वहीं दूसरी तरफ पश्चिम से एक महिला चेहरा है जो प्रदेश के बड़े राजनीतिक परिवार से संबंध रखता है जो महिला कोटे से अपनी दावेदारी ठोक रही हैं साथ ही साथ पार्टी भी आने वाले चुनाव में महिला आरक्षण को देखते हुए कुछ नामों को आगे की पंक्ति में खड़ा करना चाह रही है।

इनको भी चाहिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

इन लोगो के साथ-साथ एक युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष को लेकर भी घमासान मचा हुआ है जोकि कार्यकारिणी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी चाह रहे हैं। परंतु उन्होंने कुछ समय पहले अपने आका बदल लिए हैं और नए दरबार में हाजिरी लगाने लगे हैं ऐसे में पुराने आका कहीं न कहीं नाराज हो गए हैं , जिसके चलते उनकी नई जिम्मेदारी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। उन्हें उम्मीद है की नए आका जो कि वर्तमान में शहर की राजनीति की धुरी बने हुए हैं उनकी नैया पार लगा देंगे। पुराने आका भी भोपाल में मजबूत है और उनके अपने जातिगत और सामाजिक गणित है, जो अड़चन डाल रहे है।

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