यादगार केस: नक्सल मोर्चे से कोतवाली की गलियों तक टीआई काशीराम कुशवाह का अनकहा सफर – भक्ति के शोर में जब गूंजी खंजर की चीख: जानिए उस ब्लाइंड केस की दास्तां

यादगार केस: नक्सल मोर्चे से कोतवाली की गलियों तक टीआई काशीराम कुशवाह का अनकहा सफर
– भक्ति के शोर में जब गूंजी खंजर की चीख: जानिए उस ब्लाइंड केस की दास्तां
भोपाल, यश भारत। आज की हमारी इस कड़ी के नायक वो अफसर हैं जिन्होंने चंबल के बीहड़ों मुरैना से अपनी शुरुआत की, एसटीएफ के ऑपरेशंस देखे और मंडला के घने जंगलों में नक्सलियों का सामना किया। छतरपुर की सादगी और कर्तव्य की कठोरता का अनूठा संगम हैं निरीक्षक काशीराम कुशवाह। आजहम उनके जीवन और उनके सबसे चुनौतीपूर्ण यादगार केस की परतों को खोलेंगे।
भाग 1: जीवन की पगडंडियों से वर्दी की चमक तक
प्रश्न: : सर, छतरपुर के एक छोटे से गांव रामपुरा से भोपाल के ऐतिहासिक कोतवाली थाने तक का आपका सफर कैसा रहा?
काशीराम कुशवाह: संघर्ष ही जीवन की असली पाठशाला है। मेरी शुरुआती पढ़ाई और ग्रेजुएशन छतरपुर में ही हुई। मध्यम वर्गीय परिवेश था, पर मन में कुछ बड़ा करने की चाह थी। 2007 में जब पहली बार कंधे पर सितारे लगे, तो वो खुशी सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गांव की थी। मुरैना की पहलीसब इंस्पेक्टर की पोस्टिंग ने मुझे सिखाया कि पुलिसिंग क्या होती है। फिर एसटीएफ, विदिशा और मंडला के नक्सल मोर्चों ने मुझे एक नई पहचान दी। 12 अगस्त 2023 को जब मैंने थाना प्रभारी के रुप में कोतवाली की कमान संभाली, तो यहाँ की तंग गलियां मेरे लिए एक नई चुनौती लेकर खड़ी थीं।
भाग 2: वो केस… जिसने खाकी की साख को चुनौती दी
प्रश्न: आपने अपने करियर में अंधे कत्ल और किडनैपिंग जैसे अनगिनत मामले सुलझाए, पर अक्टूबर 2025 का वो लूट कांड आपके लिए इतना खास और यादगार क्यों है?
काशीराम कुशवाह: देखिए, कुछ वारदातें ऐसी होती हैं जो सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहतीं। वो दोपहर भक्ति की थी, झांकियों का माहौल था। एक युवक को कबाड़खाना गली में दो नकाबपोशों ने घेरकर न केवल लूटा, बल्कि उसके शरीर को खंजरों से छलनी कर दिया। जब मैंने उस घायल को अस्पताल में देखा, तो उसके बहते खून ने मुझसे सवाल किया क्या हम त्योहार मनाने भी नहीं निकल सकते? वो पल मेरे लिए साख का सवाल बन गया था। अपराधी नकाबपोश थे, कोई सुराग नहीं था, बस एक अंधा मोड़ था।
भाग 3: 250 कैमरों का वो डिजिटल चक्रव्यूह
प्रश्न: : सर, नकाबपोश आरोपी और हजारों की भीड़… आपने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए क्या रणनीति अपनाई?
काशीराम कुशवाह: जब इंसान हार मानता है, तब तकनीक काम आती है। मैंने अपनी टीम को एक ही मिशन दिया हमें अपराधी नहीं, उनकी परछाईं ढूंढनी है। हमने पुराना कबाड़खाना से लेकर हमीदिया रोड तक के 250 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे खंगाले। घंटों तक स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखीं। एक-एक संदिग्ध की कद-काठी और भागने के तरीके का मिलान किया। वह किसी सस्पेंस फिल्म जैसा था। आखिर में, तकनीक और मुखबिरों के सटीक जाल ने उन 4 नकाबपोशों (निखिल, रितिक, संजेश और शिवा) को बेनकाब कर दिया।
प्रश्न: जब आरोपियों के हाथ में हथकड़ी लगी और लूट का माल बरामद हुआ, तो उस वक्त मन में क्या भाव थे?
काशीराम कुशवाह: उस वक्त सिर्फ एक ही सुकून थाव इंसाफ। जब उस पीड़ित को उसकी सोने की चैन और शिवलिंग का लॉकेट वापस मिला, तो उसकी आँखों की चमक मेरे लिए किसी भी मेडल से बड़ी थी। वह केस यादगार इसलिए है क्योंकि हमने साबित किया कि कोतवाली की गलियां कितनी भी तंग क्यों न हों, कानून की पहुंच से बाहर नहीं हैं।
भाग 4: जनता के लिए संदेश
प्रश्न: : अंत में, हमारे दर्शकों और अपराधियों के लिए आपका क्या संदेश है?
काशीराम कुशवाह: जनता से बस इतना आपकी सुरक्षा हमारा संकल्प है। और अपराधियों के लिए नकाब चेहरे पर चढ़ सकता है, कानून के हाथ पर नहीं







