
जबलपुर, यशभारत । प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो (El Nio) की स्थिति का असर इस वर्ष मध्यप्रदेश और जबलपुर जिले के मानसून पर पड़ने की आशंका जताई गई है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो के प्रभाव से प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा, लंबे शुष्क अंतराल और तापमान में वृद्धि हो सकती है। ऐसे हालात को देखते हुए किसानों के लिए विशेष कृषि परामर्श जारी किया गया है, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।
कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका सीधा प्रभाव भारत के मानसून पर पड़ता है, जिससे वर्षा कम होने, खेतों में नमी घटने, बुवाई में देरी और फसल उत्पादन प्रभावित होने की संभावना रहती है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे कम अवधि में तैयार होने वाली एवं सूखा-सहनशील फसलों और किस्मों का चयन करें। धान, मक्का, अरहर, उड़द, तिल, सोयाबीन, कोदो और कुटकी जैसी फसलों की उन्नत एवं सूखा-रोधी किस्मों की बुवाई करने की अनुशंसा की गई है। साथ ही धान की सीधी बुवाई को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों ने वर्षा जल संरक्षण के लिए खेत
तालाब, मेड़बंदी और रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसी तकनीकों को अपनाने, मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग, जीरो-टिल सीड ड्रिल और रिज-फ्रो पद्धति का उपयोग करने की भी सलाह दी है। किसानों से संतुलित उर्वरक प्रबंधन, जैविक खादों का उपयोग, खरपतवार नियंत्रण और फसल विविधीकरण अपनाने का आग्रह किया गया है। एडवाइजरी में कहा गया है कि सूखे के तनाव की स्थिति में वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार पोटेशियम नाइट्रेट (केएनओ3) सहित उपयुक्त तरल एवं जैव उर्वरकों का छिड़काव लाभकारी हो सकता है। किसानों को मौसम विभाग के साप्ताहिक पूर्वानुमान के आधार पर ही बुवाई, सिंचाई और अन्य कृषि कार्य करने तथा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की सलाह भी दी गई है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि समय रहते वैज्ञानिक सलाह का पालन करने से अल नीनो के संभावित प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है और फसलों को नुकसान से बचाया जा सकता है।






