लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना अब आरटीआई के दायरे में, सुप्रीम कोर्ट ने 2011 की अधिसूचना रद्द की

लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना अब आरटीआई के दायरे में, सुप्रीम कोर्ट ने 2011 की अधिसूचना रद्द की
भोपाल, यश भारत । उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को मध्य प्रदेश सरकार की 25 अगस्त 2011 की उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया, जिसके माध्यम से लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) को सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एसपीई न तो कोई खुफिया संगठन है और न ही सुरक्षा संगठन, इसलिए उसे आरटीआई अधिनियम से छूट नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की खंडपीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त अधिनियम, 1981 के तहत लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त का कार्य लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार और कदाचार से जुड़े मामलों की जांच करना है। विशेष पुलिस स्थापना इन मामलों की जांच में सहयोगी एजेंसी के रूप में कार्य करती है। इसके अधिकार क्षेत्र में खुफिया जानकारी एकत्र करना, आंतरिक सुरक्षा या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कार्य शामिल नहीं हैं।
न्यायालय ने कहा कि सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 24(4) के तहत राज्य सरकार केवल वास्तविक खुफिया और सुरक्षा संगठनों को ही आरटीआई से छूट प्रदान कर सकती है। चूंकि एसपीई इस श्रेणी में नहीं आता, इसलिए उसे दी गई छूट कानून की मंशा के विपरीत है। अदालत ने माना कि 2011 की अधिसूचना कानून से अधिक व्यापक थी और उसे बनाए नहीं रखा जा सकता।
पुलिस निरीक्षक के आवेदन से शुरू हुआ मामला
यह मामला कटनी जिले के माधवनगर थाने में पदस्थ रहे तत्कालीन थाना प्रभारी कामता प्रसाद मिश्रा से जुड़ा है। उन पर 11 अप्रैल 2017 को रिश्वत लेने के आरोप में विशेष पुलिस स्थापना द्वारा प्रकरण दर्ज किया गया था। बाद में 20 मई 2020 को उनके विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति प्रदान की गई।
मिश्रा ने 1 जुलाई 2020 को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन देकर अभियोजन स्वीकृति से संबंधित संचिका, टिप्पणियां और पत्राचार सहित अन्य दस्तावेजों की जानकारी मांगी थी। विशेष पुलिस स्थापना ने 2011 की अधिसूचना का हवाला देते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया। राज्य सूचना आयोग ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
इसके बाद मिश्रा ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की शरण ली। उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2021 में विशेष पुलिस स्थापना के आदेशों को निरस्त करते हुए मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। इस निर्णय को चुनौती देते हुए विशेष पुलिस स्थापना ने उच्चतम न्यायालय में आपराधिक अपील दायर की थी।
भ्रष्टाचार की जांच तक सीमित है एसपीई का कार्यक्षेत्र
उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि मध्य प्रदेश विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1947 के तहत गठित एसपीई का कार्यक्षेत्र केवल लोक सेवकों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार, आपराधिक विश्वासभंग और धोखाधड़ी जैसे अपराधों की जांच तक सीमित है। वर्ष 1959, 1989, 2000 और 2001 में जारी अधिसूचनाओं के माध्यम से भी इसके अधिकारों का विस्तार केवल भ्रष्टाचार संबंधी अपराधों तक ही किया गया है।
अदालत ने कहा कि एसपीई का कार्य उन केंद्रीय एजेंसियों से पूरी तरह अलग है, जिन्हें सूचना के अधिकार अधिनियम की दूसरी अनुसूची में शामिल कर छूट प्रदान की गई है। इनमें सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और राष्ट्रीय जांच अभिकरण जैसी संस्थाएं शामिल हैं, जो सुरक्षा और खुफिया गतिविधियों से सीधे जुड़ी हैं।
उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले के बाद लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना को भी आरटीआई अधिनियम के तहत मांगी गई सूचनाओं पर कानून के अनुसार जवाब देना होगा।







