जबलपुरमध्य प्रदेश

स्टेशन पर बने धुआंधार में न धुंआ दिख रहा न धार

जब अफसर से यशभारत ने पूछा तो वह भी उलझन में...!

जबलपुर यशभारत। यात्रियों को आकर्षित करने और शहर की पहचान धुआंधार जलप्रपात को स्टेशन पर सजाने का दावा तो रेलवे प्रशासन ने बड़े गर्व के साथ किया था। कहा गया था कि जब यात्री प्लेटफॉर्म पर आएंगे तो उन्हें धुआंधार का भव्य नजारा दिखेगा और वे जबलपुर की खूबसूरती का अहसास यहीं से कर लेंगे। मगर हकीकत इसके ठीक उलट है।

बता दें कि मुख्य रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 6 की बिल्डिंग पर जो कलाकृति बनाई गई है उसमें न धुंआ नजर आता है और न धार। यात्री ही नहीं, खुद स्टेशन अफसर भी यह बताने में असमर्थ हैं कि आखिर यह धुआंधार बना कहां है। वहीं जब यशभारत ने स्टेशन के एक अफसर से पूछा कि धुआंधार कहां पर है तो वह बोले यहां कहां है इसी दौरान उनके एक सहयोगी ने उन्हें बताया कि हां कलाकृति तो बनी है तो वह कुर्सी से उठे और उन्होंने प्लेटफार्म नंबर 6 की बिल्डिंग में बने धुआंधार की कलाकृति को पहली बार देखा।

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बनी तो है पर लोकेशन गुप्त

वहीं इस संबंध में यात्रियों की मानें तो स्टेशन का यह धुआंधार किसी खजाने की खोज से कम नहीं है। लोग घूम-घूमकर दीवारें निहारते हैं प्लेटफॉर्म से बाहर तक नजरें दौड़ाते हैं, लेकिन धुआंधार कहीं दिखाई नहीं देता। कोई कहता है यात्रियों के लिए कलाकृति बनी है तो कोई बोलता है बनी तो है पर लोकेशन गुप्त रखी गई है।” अफसरों की स्थिति भी कम दिलचस्प नहीं है। पूछने पर वे भी मानो गूगल मैप पर लोकेशन सर्च करने लगते हैं।

मजाक बन गई यह कलाकृति

लाखों रुपए खर्च कर बनाई गई इस कलाकृति का हाल यह है कि यह आकर्षण का केंद्र बनने के बजाय अब मजाक का विषय बन चुकी है। यात्रियों का कहना है कि स्टेशन प्रशासन ने इसे धुआंधार का नाम दिया, लेकिन सही नाम “ढूंढाधार” होना चाहिए था, क्योंकि यहां सबसे बड़ा रोमांच इसे ढूंढने में ही है। कुछ लोग तो इसे “भ्रमांधार” तक कह रहे हैं, क्योंकि देखने पर लगता है कि कोई कल्पना ज्यादा है और कलाकारी कम।

सजावट के नाम पर करोड़ों खर्च

स्टेशन पर सफाई और सजावट के नाम पर अक्सर करोड़ों का बजट खर्च होता है। मगर सवाल यह है कि जब इतनी लागत में बनाई गई कलाकृति ही लोगों को समझ नहीं आ रही तो इसका फायदा क्या हुआ? शहर की पहचान दिखाने की पहल उलटे यात्रियों को गुमराह करने लगी है।

यात्रियों का अपना अपना तर्क

इस संबंध में यात्रियों की प्रतिक्रियाएं भी कम मजेदार नहीं हैं। एक यात्री ने मुस्कराते हुए कहा – “धुआंधार की धार तो दूर, यहां तो धुंआ तक नहीं उठ रहा। लगता है प्रशासन ने बिना पानी और बिना रंग के ही यह कलाकृति पूरी कर दी।” वहीं एक अन्य यात्री ने तंज कसा – “अगर प्रशासन को ही न पता हो कि कलाकृति कहां है, तो आम लोग इसे कैसे देख पाएंगे?”

यात्रियों के लिए हंसी बनी कलाकृति

दरअसल रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर स्थानीय संस्कृति और पहचान से जुड़ी कलाकृतियां बनाना एक अच्छी पहल मानी जाती है। लेकिन जब वही कलाकृति यात्रियों को हंसी का पात्र बना दे, तो उद्देश्य ही धरा रह जाता है। जबलपुर के धुआंधार झरने की भव्यता पूरे देश में चर्चित है, लेकिन स्टेशन पर इसे जिस तरह पेश किया गया है, वह यात्रियों के लिए न आकर्षण का केंद्र है और न ही शहर की असली खूबसूरती का अहसास करा पा रहा।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब लाखों रुपए खर्च कर बनाई गई कलाकृति ही लोगों को समझ न आए, तो आखिर ऐसी योजनाओं का औचित्य क्या रह जाता है?

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