25 साल से गड्ढों में दफन विकास, छिदिया-हीरापुर की जनता पूछ रही : आखिर क्या कसूर है हमारा, पार्षदों ने दी आंदोलन की चेतावनी

कटनी/बरही, यशभारत। नगर परिषद बरही के अध्यक्ष और पार्षद इस दफा एक और अजूबा कार्य करने वाले है। अध्यक्ष ने जहां कलेक्टर को खत लिखकर गड्ढों में तब्दील सडक़ का निर्माण कराने की मांग की है तो वहीं परिषद के उपाध्यक्ष मोहन सिंह, पार्षद संतोष द्विवेदी, परिषद के निर्माण प्रभारी पार्षद ईकबाल पवार, पार्षद पति श्रवण सोनी, पार्षद हीरालाल महतेल सडक़ की इस समास्या को लेकर आंदोलन करने की धमकी दे चुके है। काबिले गौर यह दिलचस्प है कि ये सभी सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष और पार्षद है। बीते इन 4 वर्ष में ये उक्त सडक़ नहीं बनवा पाए, जबकि इनकी नगर परिषद में खुद की सत्ता भी है। कायदे से इन्हें परिषद से प्रस्ताव पासकर शासन-प्रशासन के पास भेजना था, जो ये नहीं कर पाए। सबसे दिलचस्प बात यह भी यह जर्जर मार्ग की हालत पिछले 2 दशक से ऐसी ही है, इस मार्ग का उपयोग गिट्टी लोड बड़े वाहन कर रहे हैं, जिसका 10 फीसदी राजस्व डीएमएफ जिला प्रशासन के खाते में जमा होता है, जो हर वर्ष करोड़ों में है, वाबजूद इसके जिम्मेदार जिला प्रशासन भी मूक बना हुआ है और हर वर्ष वर्षा ऋतु में इसी तरह की मांग उठती है, जिसके बाद सांस फूल जाती है। अध्यक्ष की गुहार और पार्षदों की धमकी का असर क्या होता है यह तो वक्त ही बताएगा।
हर वर्ष डीएमएफ में करोड़ों रुपए जमा, फिर भी अनदेखी
नगर परिषद बरही के छिदिया-हीरापुर क्षेत्र के रहवासी पिछले 2 दशक से सडक़ की बदहाली का दंश झेल रहे है। बरसात में सडक़ बड़े-बड़े गड्ढों में तब्दील हो जाती है और इन गड्ढों में भरा गंदा पानी देखकर ऐसा लगता है मानो सडक़ नहीं, बल्कि तालाब बन गया हो। कीचड़, गंदगी और मच्छरों के बीच रहवासी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। आलम यह है कि राहगीरों, महिलाओं, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई जगह सडक़ की स्थिति इतनी खराब है कि यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सडक़ कहां है और गड्ढा कहां। तो वही गर्मी में कीचड़ सूखते ही यही सडक़ धूल का मैदान बन जाती है। सबसे चौकाने वाला पहलू यह है कि क्षेत्र के ददरा, कनौर, जाजागढ़ में संचालित माइंस और क्रशर प्लांट से गिट्टी का परिवहन इसी मार्ग से होता है, जिसका 10 फीसदी राजस्व डीएमएफ में करोड़ों रूपये हर वर्ष जिला प्रशासन के खाते में जमा होता है, वाबजूद इसके जिला प्रशासन द्वारा यहां के बुनियादी सुविधाओं की ओर ध्यान नही दिया गया, जबकि उक्त फंड का उपयोग प्रभावित क्षेत्र और स्थानीय स्तर पर करने का प्रावधान है।
माइंस संचालकों पर दबाव
क्रशर प्लांटों से भारी वाहनों के जरिए गिट्टी का परिवहन उक्त मार्ग का उपयोग कर किया जा रहा है। खस्ताहाल, बदहाल सडक़ की मररम्मत यहां के माइंस संचालकों द्वारा लम्बे अरसे से किया जा रहा है और प्रशासन उन्ही पर सडक़ मरम्मत कराने का दबाव डाल रहा है, जबकि सडक़ निर्माण की वास्तविक जिम्मेदार शासन-प्रशासन की है। खनिज संचालकों से ली जा रही रायल्टी और डीएमएफ का उपयोग आखिर जिला प्रशासन इस मार्ग के निर्माण में क्यों नही कर रहा है, यह बड़ा सवाल है।
2 सितंबर को आंदोलन की धमकी
कलेक्टर के नाम तहसीलदार और टीआई को दिए गए ज्ञापन में एक सप्ताह में समस्या का निदान न होने पर आंदोलन की धमकी दी गई है, जिसकी तिथि 2 सितंबर मुकर्रर की गई है। क्षेत्र के पार्षद रहवासियो के साथ मिलकर धरना प्रदर्शन करने की तैयारी में है।
अस्थाई नहीं, स्थाई निर्माण की जरूरत
बरसात में सडक़ में गड्ढे कीचड़ और गर्मी में धूल के गुब्बार से यहां के वासिंदे नरकीय जीवन जीने मजबूर है। हर साल चेतावनी, धरना प्रदर्शन की नौटंकी होती है, जिसके बाद प्रशासन माइंस संचालकों पर दबाव बनाता है और हर बार अस्थाई रूप से सडक़ के गड्ढों को भरने का नाटक शुरू होता है। सबसे बड़ा सवाल करोडों रुपए डीएमएफ का उपयोग कर स्थाई निर्माण के प्रयास आखित क्यों नही किए जा रहे है। बहरहाल अब देखना यह दिलचस्प होगा कि इस बार की धमकी-चेतावनी सिर्फ ज्ञापन तक ही रहेगी या फिर नगर के ये जिम्मेदार कोई ठोस कदम उठाएंगे।







