मध्य प्रदेशराज्य

सागर के केंद्रीय विश्वविद्यालय में असि. प्रोफेसर की अवैध नियुक्तियों पर हाईकोर्ट हुआ सख्त : कुलपति व कार्यपरिषद पर लगाया 5 लाख का जुर्माना 

ऐसा लगता है कि विवि ने कानून का सम्मान न करने की ठान ली है : अवैध नियुक्तियों को विवि प्रशासन बेहद बेशर्मी से जारी रखना चाहता है : मप्र हाईकोर्ट 

सागर यश भारत (संभागीय ब्यूरो)/ सागर के डॉ हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में साल 2013 में हुई अवैध नियुक्तियों को 2020 में कन्फर्म किए जाने के मामले में जबलपुर हाइकोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया है। इस मामले में याचिकाकर्ता डॉ दीपक गुप्ता की याचिका पर न्यायमूर्ति विवेक जैन ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कुलपति डॉ नीलिमा गुप्ता समेत कार्यपरिषद पर 5 लाख रुपए की कास्ट भी अधिरोपित कर दी है।

      विवि के पूर्व संविदा शिक्षक डॉ. दीपक गुप्ता द्वारा हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर विवि प्रशासन द्वारा वर्ष 2013 में कथित तौर पर अवैधानिक तरीके से 157 सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के बाद 14 नवंबर 2022 की ईसी (कार्यपरिषद) की बैठक में उन्हें कन्फर्म करने के निर्णय को निरस्त करने की याचना की थी।      

    जबलपुर हाइकोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन ने इस मामले में मंगलवार को आदेश पारित करते हुए विवि प्रशासन को सिर्फ फरवरी 2020 की ईसी की बैठक में योग्य पाए गए सहायक प्राध्यापकों के 15 नवंबर 2025 तक पुन: साक्षात्कार लेने को निर्देशित किया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में यह भी स्पष्ट किया कि आगामी तीन महीने में दोबारा इंटरव्यू नहीं लिए जाने पर वर्ष 2013 में नियुक्त सहायक प्राध्यापकों की सेवाएं समाप्त की जाएं।

 इस मामले में मप्र हाईकोर्ट जबलपुर के न्यायमूर्ति विवेक जैन ने हरीसिंह गौर केंद्रीय विवि पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि विवि प्रशासन, कानून या नियमों का बिल्कुल भी सम्मान नहीं करता है। उसने प्रशासनिक कार्रवाई में सभी कानूनी सिद्धांत व निष्कर्षों की अवहेलना करने की ठान ली है।

 न्यायमूर्ति श्री जैन ने अपने आदेश में आगे कहा है कि सार्वजनिक नियुक्ति में पारदर्शिता का रखा जाना पहली की और महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसके लिए विज्ञापन में चयन और भर्ती के लिए स्थापित नियमों और उपलब्ध पदों की संख्या स्पष्ट होना चाहिए। ऐसा करने से मनमानी रोकी जा सकती है। प्रक्रिया शुरु होने के बाद चयन के मापदंडों को बदलने से रोका जा सकता है, ताकि किसी अभ्यर्थी की जगह अन्य व्यक्ति का चयन नहीं हो सके। उन्होंने कहा है कि इस मामले में विश्वविद्यालय को विजिटर जांच और विजिटर द्वारा पूरी प्रक्रिया रद्द करने की सलाह के बावजूद विवि अपनी ही जाने-माने गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश में सुधारात्मक कार्रवाई नहीं करना चाहता और बेहद बेशर्मी से इस अवैधता को जारी रखना चाहता है।

 

न्यायमूर्ति विवेक जैन ने सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति को कन्फर्म करने वाली ईसी के सदस्यों पर 5 लाख रु. का जुर्माना भी लगाया। इस राशि में से मप्र पुलिस कल्याण कोष को 2 लाख रु, राष्ट्रीय रक्षा कोष को 1 लाख रु, सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष में 1 लाख रु, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को 50 हजार रु और उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन को 50 हजार रु. दिए जाएं। हाईकोर्ट ने उपरोक्त समस्त राशि 14 नवंबर 2022 की ईसी की अध्यक्षता करने वाली कुलपति प्रो. नीलिमा गुप्ता एवं सदस्यों से वसूलने के लिए विवि प्रशासन स्वतंत्रता दी है।

तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर गजभिए को हुई थी 100 दिन की जेल 

मप्र हाईकोर्ट का उक्त आदेश विश्वविद्यालय से लेकर शहर की गलियों तक चर्चा का विषय बन गया है। तत्कालीन कुलपति प्रो. एनएस गजभिए ने नई भर्ती के रास्ते धन बटोरने लालच में यहां पहले से ही चयनित होकर काम कर रहे सवा सौ से ज्यादा संविदा शिक्षकों को हटा दिया था। इसके खिलाफ डॉ अनिल पुरोहित, डॉ दीपक गुप्ता, डॉ संदीप सबलोक, डॉ वेद प्रकाश दुबे आदि ने सड़क से लेकर कोर्ट तक लंबी लड़ाई लड़ी थी। इसके बावजूद प्रोफेसर गजभिए ने नई नियुक्तियों के लिए पद विज्ञापित कर 76 पद के विरुद्ध 157 लोगों को नियुक्त कर लिया था। इन नियुक्तियों में गड़बड़ियों के खिलाफ में उक्त संविदा शिक्षकों और आरटीआई व्हिसल ब्लोअर अरविंद भट्ट के प्रयासों से सीबीआई द्वारा केस दर्ज किया गया था और करीब 100 दिन तक प्रोफेसर गजभिए को जेल की हवा खाना पड़ी थी।

विवि छोड़कर प्रमोशन लेने वालों पर भी गिर सकती है गाज

 डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा तीन साल पहले इनमें से 82 सहायक प्राध्यापकों को कन्फर्म कर दिया गया था तथा 10 का कन्फर्मेशन रोक लिया गया था। शेष करीब 60 सहायक प्राध्यापकों ने विवि में करीब 8-10 साल सेवाएं देने के बाद दूसरे विश्वविद्यालयों में उच्च पद पर ज्वाइन कर लिया था। इनके अलावा पत्रकारिता विभाग के एक और उर्दू विभाग के तीन सहायक प्राध्यापकों को बर्खास्त कर दिया गया था। जबकि एक सहायक प्राध्यापक की मृत्यु हो गई थी। मप्र हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब दूसरे विवि में नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों के अनुभव के वर्ष विवादित हो गए हैं जिन्हें अयोग्य मानते हुए संबंधित विवि भी उन्हें सेवा से पृ़थक कर सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button