यशभारत संपादकीय: चुनाव आयोग पर उठते सवाल, लोकतंत्र में भरोसा सबसे बड़ी कसौटी

– आशीष सोनी
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों की रिपोर्ट ने देश में नई बहस को जन्म दे दिया है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा पिछले 10 महीनों में 14 बार अनेक मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आते ही पूरा विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमलावर हो गया है। आरोपों के छींटे सत्तारूढ़ भाजपा के दामन को मैला कर रहे हैं। लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ‘वोट चोरी’ को भारतीय लोगों के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला बताया। कांग्रेस की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पद पर बने रहने के अधिकार पर भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष के कुछ नेताओं ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए हालिया विधानसभा चुनावों को निरस्त कर दोबारा मतदान कराने जैसी मांगें भी रखी हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया है। भाजपा सांसद एवं प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि आयोग के भीतर चर्चा और अलग-अलग राय लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है तथा विपक्ष जनादेश खोने के कारण संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठा रहा है। उनका कहना है कि अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से हुए। चुनाव आयोग का अपना पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आयोग ने कहा है कि लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था की सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार पिछले एक वर्ष में चुनाव सुधार की करीब 40 पहल की गईं और केवल दस महीनों की टिप्पणियों या आपत्तियों के आधार पर पूरी तस्वीर नहीं देखी जा सकती। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि अलग राय को औपचारिक असहमति मानना उचित नहीं है और उसके सभी निर्णय स्थापित वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुए हैं। सवाल यह है कि अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से हुआ, संबंधित सदस्यों को पर्याप्त जानकारी मिली या नहीं, आपत्तियों पर क्या विचार हुआ और मतदाता को इसका भरोसेमंद उत्तर कैसे मिलेगा। इसी बीच चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताजा घटनाक्रम भी महत्वपूर्ण है। 23 सितंबर को दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय दी और मामला संविधान पीठ के समक्ष जाने का रास्ता खुला। 2023 के कानून के तहत नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट में इसी व्यवस्था की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। दरअसल एसआईआर का विवाद अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। इसके तीन आयाम हैं—मतदाता सूची की शुद्धता, चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की संस्थागत स्वतंत्रता। कांग्रेस द्वारा ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और उनके कार्यकाल में हुए चुनावों पर सवाल उठाने की मांग राजनीतिक रूप से बहुत गंभीर है। लेकिन किसी भी चुनाव को निरस्त करने जैसा कदम केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस प्रमाण, कानूनी प्रक्रिया और सक्षम संवैधानिक अथवा न्यायिक निर्णय के आधार पर ही तय किया जा सकता है। इसी तरह आयोग की ओर से सर्वसम्मति का दावा भी तभी जनता का विश्वास पूरी तरह मजबूत कर सकता है, जब महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं और निर्णयों से जुड़े तथ्य पर्याप्त रूप से स्पष्ट किए जाएं। आज आवश्यकता आरोपों की तीव्रता बढ़ाने की नहीं, तथ्यों की स्पष्टता बढ़ाने की है। यदि आपत्तियां दर्ज हुई हैं तो उनकी प्रकृति क्या थी? किन निर्णयों पर उठीं? उनका समाधान कैसे हुआ। एसआईआर में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? राजनीतिक दलों और नागरिकों को उपलब्ध डेटा की स्वतंत्र जांच की क्या व्यवस्था है? ऐसे सवालों के जवाब सार्वजनिक होंगे तो विवाद स्वतः तथ्य और कानून की कसौटी पर आ जाएगा। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष को संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने की जिम्मेदारी है, तो विपक्ष की जिम्मेदारी भी यह सुनिश्चित करने की है कि गंभीर आरोप प्रमाण और तथ्यों के साथ रखे जाएं। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी इससे भी बड़ी है—उसे केवल निष्पक्ष होना ही नहीं, बल्कि जनता को उसकी निष्पक्षता दिखाई भी देनी चाहिए। आखिरकार चुनाव किसी सरकार, विपक्ष या किसी एक संस्था का निजी विषय नहीं है। यह उस नागरिक का अधिकार है जो मतदान केंद्र तक पहुंचकर अपना प्रतिनिधि चुनता है। इसलिए इस पूरे विवाद का अंतिम केंद्र न कांग्रेस होना चाहिए, न भाजपा और न ही कोई व्यक्ति—केंद्र में होना चाहिए भारत के मतदाता का विश्वास।








