चरणदास चोर के साथ संपन्न हुआ 22वां स्मरण हबीब रंग आलाप सत्य की कीमत और लोक रंगों की ताकत ने रवींद्र भवन में जीता दर्शकों का दिल
The 22nd 'Habib Rang Aalaap' tribute event concluded with the play *Charandas Chor*. The price of truth and the power of folk aesthetics won the hearts of the audience at Rabindra Bhavan.

चरणदास चोर के साथ संपन्न हुआ 22वां स्मरण हबीब रंग आलाप
सत्य की कीमत और लोक रंगों की ताकत ने रवींद्र भवन में जीता दर्शकों का दिल
भोपाल यश भारत। हम थियेटर ग्रुप द्वारा रवींद्र भवन में आयोजित 22वें स्मरण हबीब रंग आलाप नाट्य महोत्सव का समापन रंगकर्मी हबीब तनवीर के कालजयी नाटक चरणदास चोर के प्रभावशाली मंचन के साथ हुआ। नया थियेटर भोपाल के कलाकारों ने छत्तीसगढ़ी लोकशैली नाचा और पंथी नृत्य की जीवंत प्रस्तुति से दर्शकों को बांधे रखा। ठहाकों लोकधुनों और गहरे सामाजिक संदेश से भरपूर इस प्रस्तुति ने महोत्सव को यादगार विदाई दी। विजयदान देथा की राजस्थानी लोककथा पर आधारित यह नाटक एक ऐसे चोर की कहानी है जो चोरी तो करता है लेकिन अपने गुरु को दिए चार वचनों में सबसे महत्वपूर्ण वचन कभी झूठ न बोलने को अंत तक निभाता है। परिस्थितियां उसे बार-बार समझौते के लिए मजबूर करती हैं लेकिन सत्य से समझौता न करने की कीमत वह अपने प्राण देकर चुकाता है। नाटक दर्शकों के सामने यह प्रश्न खड़ा करता है कि आखिर असली चोर कौन है। वर्ष 1975 में पहली बार मंचित हुआ चरणदास चोर हबीब तनवीर के सबसे चर्चित नाटकों में शामिल है। एडिनबर्ग फेस्टिवल से लेकर ब्रॉडवे तक अपनी छाप छोड़ने वाले इस नाटक ने भारतीय लोक रंगमंच को वैश्विक पहचान दिलाई। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को राष्ट्रीय मंच प्रदान कर हिंदी रंगमंच को नई दिशा दी। प्रस्तुति में हबीब तनवीर की मूल संरचना को बरकरार रखा गया। खुले मंच एक चबूतरे और पेड़ की प्रतीकात्मक सज्जा के बीच कलाकार स्वयं दृश्य परिवर्तन करते और कोरस का हिस्सा बनते नजर आए। ढोलक तबला मंजीरा मांदल और छत्तीसगढ़ी गम्मत की धुनों ने रवींद्र भवन को मानो गांव की चौपाल में बदल दिया। चरणदास की भूमिका में सतीश व्याम ने मासूमियत और चतुराई का प्रभावशाली मिश्रण प्रस्तुत किया। रानी के किरदार में शीतल घुघे और गुरु की भूमिका में इमरान अली ने भी दर्शकों की खूब सराहना बटोरी। पंथी नृत्य की प्रस्तुति के दौरान गूंजे सत्य नाम, सत्य नाम के स्वर पूरे सभागार को भाव विभोर कर गए। नाटक का चरम दृश्य जब झूठ बोलने से इनकार करने पर चरणदास को मृत्यु दंड दिया जाता है दर्शकों को स्तब्ध कर गया। यह प्रस्तुति आज के दौर में भी सत्य नैतिकता और सत्ता के संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े करती दिखाई दी। महोत्सव के निदेशक बालेंद्र सिंह ने कहा कि हबीब तनवीर मानते थे कि थियेटर जनता का होता है और चरणदास चोर से बेहतर समापन संभव नहीं था। नया थियेटर के रामचंद्र सिंह ने बताया कि दल में आज भी कई ऐसे कलाकार शामिल हैं जिन्होंने स्वयं हबीब तनवीर के साथ काम किया है और उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। पांच दिनों तक चले 22वें स्मरण हबीब रंग आलाप में पांच नाटकों का मंचन हुआ। जिन लाहौर नई वेख्या से शुरू हुई यह रंगयात्रा चरणदास चोर के साथ सत्य और मानवीय मूल्यों के संदेश पर आकर पूर्ण हुई।







