यशभारत,जबलपुर : संपादकीय — पदकों से आगे, खेल महाशक्ति बनने का सपना
भारत में खेलों की तस्वीर तेजी से बदल रही है

भारत में खेलों की तस्वीर तेजी से बदल रही है। देश में एक से बढ़कर एक प्रतिभाएं, जोश भरी युवा शक्ति और अब खेलों के प्रति बढ़ता आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा है बस जरूरत केवल इन शक्तियों को दीर्घकालीन नीति और मजबूत खेल ढांचे से जोड़ने की है। कभी क्रिकेट के इर्द-गिर्द सिमटी भारतीय खेल संस्कृति आज एथलेटिक्स, बैडमिंटन, हॉकी, मुक्केबाजी, कुश्ती, शतरंज और पैरा-स्पोर्ट्स जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। हाल ही में अटलांटा के ग्लासगो में हुए कॉमन वेल्थ गेम्स इस की बानगी है है जहां हमारे खिलाड़ियों ने पदकों का अंबार लाग दिया था। भारतीय खिलाड़ियों का अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बढ़ता प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि देश अब खेलों को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति और युवा विकास के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2036 ओलंपिक को ध्यान में रखते हुए अभी से खिलाड़ियों को तैयार करने पर जोर देना समय की जरूरत है। ओलंपिक पदक अचानक नहीं मिलते। इसके लिए वर्षों की तैयारी, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, बेहतर पोषण, मानसिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं का अनुभव जरूरी होता है। पांच से 15 वर्ष की उम्र में प्रतिभाओं की पहचान करने की पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है। देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल युवा आबादी है। लेकिन देश के गांवों और छोटे शहरों में आज भी ऐसी प्रतिभाएं मौजूद हैं, जिन्हें उचित मैदान, प्रशिक्षक और संसाधन नहीं मिल पाते। खेलो इंडिया जैसी योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब प्रतिभा की खोज महानगरों और चुनिंदा अकादमियों से निकलकर गांव-गांव तक पहुंचे। खेल महाशक्ति बनने के लिए केवल नए स्टेडियम बनाना पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षित कोच, फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ, खेल मनोवैज्ञानिक, आधुनिक उपकरण और खेल विज्ञान की सुविधाएं भी जरूरी हैं। टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम जैसी योजनाओं से शीर्ष खिलाड़यिों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण मिल रहा है, लेकिन इसी व्यवस्था को जमीनी स्तर के खिलाड़ियों तक भी पहुंचाना होगा। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी लंबे समय तक यही रही कि कुछ चुनिंदा खेलों को छोड़कर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हमारी भागीदारी सीमित रही। यदि ओलंपिक में पदकों की संख्या बढ़ानी है तो निशानेबाजी, तीरंदाजी, एथलेटिक्स, तैराकी, साइकिलिंग, जिम्नास्टिक सहित अधिक से अधिक खेलों में मजबूत आधार तैयार करना होगा। केवल कुछ स्टार खिलाड़ियों की निर्भरता से खेल महाशक्ति बनने का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। खेलों के प्रति समाज का नजरिया निश्चित रूप से बदला है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। माता-पिता को यह भरोसा दिलाना होगा कि खेल और शिक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नियमित खेल गतिविधियों को बढ़ावा देना होगा। बच्चों को कम उम्र से ही उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप खेल चुनने का अवसर मिलना चाहिए। 2036 ओलंपिक भारत के लिए गौरव का विषय हो सकती है, लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती यह है कि उस समय तक देश के पास विश्वस्तरीय खिलाड़ियों की मजबूत पीढ़ी तैयार हो। आज जो बच्चे खेल के मैदान में उतर रहे हैं, वही आने वाले वर्षों में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। भारत को खेल महाशक्ति बनना है तो लक्ष्य सिर्फ पदक जीतना नहीं, बल्कि ऐसी खेल संस्कृति बनाना होगा जिसमें प्रतिभा संसाधनों के अभाव में दम न तोड़े। 2036 का ओलंपिक भारत के लिए केवल मेजबानी का अवसर नहीं, बल्कि विश्व खेल मंच पर नई पहचान बनाने का ऐतिहासिक पड़ाव बन सकता है।







