यश भारत विशेष : दशहरे पर अनूठी आस्था, दशानन की देव तुल्य चौखट, यहां बरसती है कृपा; मन्नत पूरी करने वाले ‘देवता’ बने रावण-कुंभकर्ण

रीवा । दशहरे पर जहां देश में रावण जलता है, वहीं मध्य प्रदेश के भाटखेड़ी गांव में उसका शृंगार कर पूजा-अर्चना की जाती है। राजगढ़ जिले के ब्यावरा तहसील का यह गांव अपनी इसी अनूठी और 150 साल पुरानी परंपरा के कारण पूरे अंचल में ‘रावण की भाटखेड़ी’ के नाम से मशहूर है।
यहां मन्नत पूरी करने वाले ‘देवता’ हैं रावण और कुंभकर्ण
विजयादशमी के दिन जब चारों तरफ बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के तौर पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले धू-धू कर जलते हैं, तब भाटखेड़ी में माहौल बिल्कुल जुदा होता है। यहां लोग रावण को जलाने के बजाय उसकी प्रतिमा को नए वस्त्रों और रंगों से सजाते हैं, आरती उतारते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।
मिट्टी-चूने से गढ़ी आस्था की अनूठी विरासत
गांव में स्थापित रावण और कुंभकर्ण की ये विशाल प्रतिमाएं कब और किसने बनवाईं, इसका कोई पुख्ता लिखित इतिहास तो नहीं है, लेकिन बुजुर्गों के अनुसार यह सिलसिला लगभग डेढ़ सदी से चला आ रहा है। ये प्रतिमाएं पारंपरिक रूप से मिट्टी और चूने के गारे से बनाई गई थीं, जो पीढ़ियों से गांव की पहचान बनी हुई हैं।
सूखे में दिलाते हैं राहत: पूजा करते ही बरसते हैं बादल
ग्रामीणों का विश्वास है कि रावण उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। स्थानीय निवासी राधेश्याम यादव बताते हैं कि यह आस्था सिर्फ दशहरे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सालभर लोग अपनी मुरादें लेकर यहां पहुंचते हैं:
बारिश का संकट
जब इलाके में लंबे समय तक सूखा पड़ता है या मानसूनी बारिश नहीं होती, तो ग्रामीण सामूहिक रूप से रावण-कुंभकर्ण की चौखट पर मत्था टेकते हैं।
अटूट है क्षेत्रवासियों का विश्वास
ग्रामीणों का दावा है कि कई बार पूजा-अर्चना खत्म होते ही उसी दिन झमाझम बारिश शुरू हो जाती है, जिसने लोगों की इस अनोखी आस्था को और गहरा कर दिया है।







