यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री की खामोश डरावनी इमारत का खौफ

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री की खामोश डरावनी इमारत का खौफ
– 41 साल बाद भी भोपाल गैस कांड की त्रासदी का मंजर नहीं भूल पा रहे हैं लोग
अरविंद कपिल, भोपाल।
भोपाल गैस कांड की त्रासदी लोगों के जहन में आज भी हैं। 2 और 3 दिसंबर 1984 की आधी रात ने भोपाल को हमेशा के लिए बदल दिया था। मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस यूनियन कार्बाइड प्लांट से रिसने लगी। देखते ही देखते यह मौत का बादल पूरे शहर पर छा गया। जो सोए थे, वे सदा के लिए सो गए। जो जागे, वे भागते हुए भी मौत के प्रहार से बच नहीं सके। आंखों से जलधाराएं बह रही थीं, सांस टूट रही थी, लोग सडक़ों पर गिर रहे थे। आधिकारिक आंकड़े चाहे कुछ भी कहें, लेकिन पीडि़तों के अनुसार मौतों का आंकड़ा हजारों से भी ज्यादा था। हजारों बच्चे अनाथ हुए, अनगिनत परिवार छिन्न-भिन्न हो गए। यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर से हजारों टन जहरीला कचरा हटाए जाने की घोषणा भले ही सरकार ने हाल ही में कर दी हो, परंतु फैक्ट्री की जर्जर दीवारों पर जमी दहशत की परतें आज भी जस की तस हैं। पीथमपुर की डिस्पोजल साइट तक कचरा भेजे जाने की प्रक्रिया पर्यावरणीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, लेकिन भोपाल के लोगों के लिए यह केवल एक भौतिक सफाई है। दिलों में भरे घाव न तो घटे हैं और न ही मिटे हैं। फैक्ट्री के ढहते खंडहर आज भी उस चीखती रात की गवाही देते हैं, जिसे शहर कभी भूल नहीं सकता।

फैक्ट्री की ओर नजर उठाते ही घबरा जाते हैं लोग
कार्बाइड फैक्ट्री की ओर नजऱ उठाते ही आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऊँची, टूटी-फूटी, काली पड़ चुकी दीवारें—इनमें वह डर समाया है जो पीढिय़ों से लोगों की नसों में दौड़ रहा है। स्थानीय लोग बताते हैं कि फैक्ट्री का नाम सुनते ही दिमाग में मौत की गंध तैरने लगती है। वह सिर्फ एक खामोश इमारत नहीं, बल्कि हजारों लाशों, सिसकती रातों और उजड़ चुके परिवारों का प्रतीक है। गैस प्रभावित बस्तियों में आज भी लोग इसे मौत की फैक्ट्री कहकर पुकारते हैं।
मन का डर नहीं मिटा
कचरा हट जाना एक तकनीकी प्रक्रिया है, लेकिन गैस त्रासदी ने जो मनोवैज्ञानिक खौफ पैदा किया, वह अब भी कायम है। बुजुर्ग बताते हैं कि जब भी फैक्ट्री की ओर नजर पड़ती है, तो आंखों के सामने वही रात घूम जाती है—भागते लोग, दम तोड़ती सांसें, जलती आंखें और चीखों से दहला शहर। गैस पीड़ित आज भी महसूस करते हैं कि इस जगह पर न्याय अधूरा है और दर्द पूरा।
फैक्ट्री से लगे पुराने शहर के निवासी साहब खान सहित कई लोग मांग करते आ रहे हैं कि इस पूरे परिसर को एक विश्वस्तरीय स्मारक के रूप में विकसित किया जाए। उनका कहना है कि यह कोई साधारण स्थान नहीं, बल्कि विश्व इतिहास की सबसे भयावह औद्योगिक त्रासदियों में से एक की जीवित निशानी है। कचरा हट गया, लेकिन डर और दर्द अभी भी वहीं है, वे कहते हैं। लोगों का मानना है कि एक स्मारक आने वाली पीढिय़ों को सच दिखाएगा कैसे कॉर्पोरेट लापरवाही ने एक शहर की सांसें छीन लीं।
त्रासदी के 41 साल बीते, जख्म आज भी हरे
आज, त्रासदी को 41 साल बीत चुके हैं—पर फैक्ट्री की निर्जीव दीवारें आज भी उतनी ही भयावह खड़ी हैं। जगह-जगह पड़ी जंग लगी मशीनें, जर्जर पाइप, ढही हुई छतें और भीतर पसरा सन्नाटा—सब मिलकर उस रात की अंतिम चीख को जीवित रखते हैं। फिलहाल, कार्बाइड फैक्ट्री की दीवारें चुप हैं, लेकिन उनकी खामोशी में दबी हैं हजारों टूट चुकी सांसों की गूंज—जो आज भी उतनी ही तीखी है जितनी उस पहली रात थी।







