आचार्य विद्यासागर जी के आर्थिक दर्शन पर शोध कर संदेश जैन ने हासिल की पीएच.डी.
एकलव्य विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में मिली उपाधि,

जबलपुर, यश भारत। आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आर्थिक दर्शन और उनके विचारों की वर्तमान भारत में प्रासंगिकता पर शोध करने वाले संदेश जैन को पीएच.डी. की उपाधि प्रदान की गई है। एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह के प्रथम दीक्षांत समारोह में उन्हें ‘आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ते कदम’ विषय पर किए गए शोध के लिए सम्मानित किया गया। उनका शोध आचार्य श्री के आर्थिक चिंतन को आधुनिक भारत की आवश्यकताओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
संदेश जैन ने बताया कि उन्हें लगभग 10 वर्षों तक आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सान्निध्य में रहकर उनके जीवन, विचारों और सिद्धांतों को करीब से जानने-समझने का अवसर मिला। इसी अनुभव और प्रेरणा ने उन्हें आचार्य श्री के आर्थिक दर्शन का गहन अध्ययन करने तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में उनके विचारों की भूमिका को शोध के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया। उनके शोध में श्रम, संस्कार, शिक्षा, स्वावलंबन, कृषि, स्थानीय उत्पादन, भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण, भारतीय भाषाओं, हस्तशिल्प, प्राचीन शिल्पकला और भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे विषयों को आत्मनिर्भरता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में शामिल किया गया है। शोध में ‘श्रम ही धन’ और ‘संस्कार ही शिक्षा’ जैसे विचारों के महत्व को रेखांकित करते हुए शिक्षा को जीवनोपयोगी, व्यावहारिक और कौशल आधारित बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

संदेश जैन के शोध में महिला शिक्षा और आर्थिक स्वावलंबन को भी राष्ट्र की प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। इसके साथ ही कृषि, स्थानीय संसाधनों के उपयोग, पारंपरिक ज्ञान और प्राचीन भारतीय आयुर्वेद को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता को भी आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा से जोड़ा गया है।
शोध के अनुसार आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल आर्थिक रूप से सक्षम होना नहीं है, बल्कि अपनी शिक्षा, कौशल, श्रम, संस्कार, कृषि, ज्ञान और उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करना भी है। इन सभी क्षेत्रों का समन्वित विकास देश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ विकास की प्रक्रिया को लोककल्याण से जोड़ सकता है। डॉ. संदेश जैन ने कहा कि पीएच.डी. उनके लिए यात्रा का अंत नहीं, बल्कि शोध के एक नए चरण की शुरुआत है। वे आगे भी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चिंतन का प्रमाण, तथ्यों और शोध-पद्धति के आधार पर अध्ययन करते हुए उसे समकालीन भारत की आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास करेंगे।







