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कांग्रेस के अस्तबल में घोड़ों की पहचान कर गए राहुल

राहुल गांधी का भोपाल दौरा यंगमैन की छवि के साथ राजधानी भोपाल पहुंचे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संगठन के सृजन कार्यक्रम में कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के उपायों की चर्चा जिस अंदाज में की, उसने पार्टी के भीतर और बाहर नई बहस को जन्म दे दिया है। 31 मिनिट 48 सेकेंड की अपनी बात में उन्होंने नेताओं और कार्यकर्ताओं की तुलना तीन तरह के घोड़ों से करते हुए सीधे तौर पर संगठन के भीतर लकीर खींच दी है। राहुल ने कहा कि पार्टी में अब तक बारात के घोड़े रेस में और रेस के घोड़े बारात में सजते आ रहे थे, इनकी पहचान कर सही जगह भेजना होगा। अपनी बात को इससे आगे ले जाते हुए राहुल गांधी ने कहा कि इसके साथ अब लंगड़े घोड़े को भी छांटने का समय आ गया है। ऐसे घोड़ों के लिए रिटायरमेंट के साथ घरों में आराम करने का वक्त आ गया है। आकाओं के भरोसे सुविधाभोगी राजनीति करने वालों को साफ नसीहत है कि वे इसे तिलांजलि दे दें। पार्टी में अब शोभा की सुपारी नहीं चलेगी। प्रदेश भर के डीसीसी प्रेसिडेंट के सामने राहुल ने जब अपने हरफनमौला इरादे जाहिर किए तो पूरा हाल जिंदाबाद के नारों के बीच तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा। राहुल गांधी ने कहा कि कमलनाथ कहते हैं कांग्रेस रेस के घोड़े को बारात में भेज देती है। पार्टी अब एमपी के अस्तबल में रेस के नए घोड़े तैयार करने के एजेंडे पर काम करने वाली है। गुजरात के बाद एमपी में संगठन गढऩे निकले राहुल के टिप्स पर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया में कह दिया कि घोड़ा लंगड़ा हो या तगड़ा, एक दिन बूढ़ा होना ही पड़ता है। बचपन में जिसकी सवारी की हो, भारतीय संस्कृति में उसे पिता की तरह इज्जत दी जाती है। आचार्य प्रमोद कृष्णम की राह इन दिनों कांग्रेस से जुदा जरूर है, पर उनकी बात से इत्तफाक रखने वाले नेताओं की पूरी कतार अभी पार्टी में मौजूद है, इसीलिए राहुल गांधी के लिए संगठन में इस सर्जरी को करना आसान नहीं होगा। राहुल गांधी उस परिवार से हैं, जिसमें कार्यकर्ताओं की आत्मा बसती है। इस पावर सेंटर में होने वाले फैसले भी कार्यकर्ताओं के लिए पत्थर की लकीर होते हैं, लेकिन राहुल को ये भी याद रखना होगा कि नई और पुरानी पीढ़ी के बीच सामंजस्य बिठाकर नई कांग्रेस गढऩे का जोखिम इतना आसान नहीं है। जिन नेताओं ने तपती धूप में पसीना बहाकर पार्टी को सत्ता में लंबे समय तक काबिज रखा उनके अनुभवों का लाभ लेते हुए नया नेतृत्व तैयार करना है। बदलाव एक सामान्य प्रकिया है। राहुल युवा और जोशीले हैं, इसलिए वे पूरी कांग्रेस का रिफार्मेशन चाहते हैं। राहुल जानते हैं कि कमलनाथ के 15 माह छोडक़र एमपी में लगातार सत्ता से बाहर चल रही पार्टी को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने के लिए संगठन के नट बोल्ट कसने ही होंगे। सेमरिया के विधायक अभय मिश्रा ने जब कहा कि एमपी में कोई ऐसा नेता नजर नहीं आता जो पार्टी को सत्ता का रास्ता दिखा सके, तो राहुल गांधी ने फ्यूचर के अपने विजन को सामने लाते हुए साफ कहा कि ऐसे 10 नेता मुझे दिखलाई पड़ रहे हैं।
राजधानी में कांग्रेस की इस कवायद पर भाजपा की भी पैनी नजर है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को जरूर यह भरोसा है कि एमपी में राहुल गांधी का कोई असर नहीं पडऩे वाला, किंतु कांग्रेस के लोग राहुल गांधी के दौरे को संजीवनी मान रहे है। नई लीडरशिप तैयार करने की बात के साथ राहुल ने यह भी कहा कि हम नए तरह के ऑब्जेक्टिव से नेताओं को नापेंगे। चुनाव में वोट बढ़े या नहीं, दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के वक्त कांग्रेस के लोग साथ खड़े नजर आए या नहीं, इसकी भी मॉनिटरिंग होगी। उन्होंने दो टूक कहा कि पुराना रवैया अब नहीं चलेगा। कांग्रेस की विचारधारा को आगे ले जाने वाले 55 साथी ही मध्यप्रदेश की नई कांग्रेस होंगे। इन्हें अगर पद और पॉवर का माइक दिया जाएगा, तो यह भी टेस्ट किया जाएगा कि उसमें 440 वोल्ट का करंट है या नहीं। गजब के आत्मविश्वास से लबरेज राहुल अपनी बातों को अंजाम तक इस रूप में पहुंचाते दिखे कि इस हॉल में मौजूद 20 फीसद लोग मन बना लें तो भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने का काम किया जा सकता है। मध्यप्रदेश में जो भी कांग्रेस का नवसृजन चाहता है, राहुल गांधी उसके साथ खड़े हैं। बहरहाल राहुल के इस सृजन को ईमानदार साथ मिला, तब तो भविष्य की कांग्रेस के लिए ये शुभ संकेत है, वरना एमपी में पार्टी जिन दिग्गजों के चक्रव्यूह में फंसी है, उसमें राहुल को अभिमन्यु की भूमिका में आना होगा।

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