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मुंबई,यशभारत संपादकीय : भाषा, रोजगार और सामाजिक समरसता

मुंबई की पहचान ही विविधता में एकता

मुंबई सिर्फ महाराष्ट्र की राजधानी नहीं है, यह शहर पूरे देश से आने वाले लोगों के सपनों का शहर है। यहां उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और देश के दूसरे हिस्सों से आए लाखों लोग स्थानीय भूमिपुत्रों से मिल-जुल कर रोजगार करते हैं। इसी विविधता ने मुंबई को समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाया है। ऐसे में मुंबई में मराठी भाषा सीखने का सवाल केवल भाषा का नहीं, अपितु संस्कृति, रोजगार और सामाजिक समरसता का भी है।

महाराष्ट्र में मराठी राजभाषा है और राज्य की सार्वजनिक तथा सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार भी। मुंबई में रहने वाले किसी व्यक्ति से मराठी सीखने की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं कहा जा सकता। खासकर टैक्सी और रिक्शा चालक जैसे सार्वजनिक संपर्क वाले पेशों में स्थानीय भाषा का सामान्य ज्ञान यात्रियों से संवाद, मार्गदर्शन और आपात स्थिति में उपयोगी हो सकता है। लेकिन मराठी सीखने की जिम्मेदारी को डंडे या भेदभाव का माध्यम बनाने के बजाय इसे संवाद और समावेश का साधन बनाया जाना चाहिए।

कानूनी दृष्टि से भी स्थिति को संतुलित नजरिए से समझना जरूरी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को भारत के किसी भी हिस्से में आने-जाने और बसने का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 29 भाषा और संस्कृति की रक्षा से जुड़ा अधिकार देता है। संविधान की आठवीं अनुसूची में मराठी सहित 22 भाषाएं शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि स्थानीय भाषा और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रोजगार के अधिकार का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

टैक्सी और ऑटो-रिक्शा जैसे सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में भाषा की उपयोगिता अलग है। चालक को कम से कम इतनी मराठी अवश्य आनी चाहिए कि वह यात्री का गंतव्य समझ सके, सामान्य बातचीत कर सके और आवश्यकतानुसार सहायता कर सके। इसके लिए सरकार और परिवहन विभाग प्रशिक्षण तथा पर्याप्त समय उपलब्ध करा रहे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठी सीखने की समयसीमा की चर्चा की है। भाषा सीखने को रोजगार खोने की धमकी के बजाय कौशल-विकास से जोड़ना अधिक प्रभावी रास्ता होगा।

मराठी केवल सरकारी कामकाज की भाषा नहीं है, यह महाराष्ट्र की संत परंपरा, साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, लोककला और सामाजिक चेतना की भाषा भी है। मुंबई में आने वाला व्यक्ति यदि मराठी के कुछ शब्द सीखता है, स्थानीय त्योहारों और परंपराओं को समझता है और लोगों से उनकी भाषा में संवाद करता है तो यह सामाजिक समरसता को मजबूत करता है। लेकिन स्थानीय संस्कृति का सम्मान तभी व्यापक स्वीकृति हासिल करेगा, जब स्थानीय समाज भी विविधता का सम्मान करे। मुंबई की पहचान ही विविधता में एकता की रही है।

मुंबई को ऐसी भाषा नीति की जरूरत है, जिसमें स्थानीय भाषा का सम्मान और प्रवासियों के अधिकार दोनों साथ चलें। महाराष्ट्र की असली ताकत विविधता में एकता और मुंबई की सामाजिक समरसता में है। यह तभी कायम रह सकेगी, जब भाषा सम्मान और संवाद का माध्यम बने, दबाव और भेदभाव का नहीं।

 

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