जबलपुर, यश भारत। किसी के हाथ से मोबाइल छीनकर भाग जाना और किसी का मोबाइल कहीं खो जाना, दोनों अलग-अलग घटनाएं हैं। लेकिन गोहलपुर थाने में सामने आए एक मामले में शिकायत और पुलिस रिकॉर्ड के बीच यही अंतर दिखाई दे रहा है। पीड़ित का कहना है कि दो युवक उसका आईफोन छीनकर भागे थे। उसने थाने पहुंचकर इसकी शिकायत भी की, लेकिन पुलिस के दस्तावेज में मोबाइल छीने जाने के बजाय उसके गुम होने की रिपोर्ट दर्ज है। अब सवाल यह है कि जब शिकायत में मोबाइल छीनने की बात साफ लिखी गई थी, तो पुलिस ने उसे गुमशुदगी के रूप में क्यों दर्ज किया?
रात में एक्टिवा से आए दो युवक और छीनकर ले गए आईफोन
गोहलपुर थाना क्षेत्र के न्यू संस्कार परिसर निवासी मयंक सोनी ने थाना प्रभारी को दिए लिखित आवेदन में बताया कि 23 अक्टूबर 2026 की रात करीब 9:30 बजे वह गोहलपुर चौक रोड पर लेमा गार्डन सरकारी क्वार्टर के पास थे। इसी दौरान एक्टिवा से दो अज्ञात युवक वहां पहुंचे और उनका आईफोन 15 छीनकर भाग गए। घटना के बाद मयंक ने पुलिस से शिकायत कर मोबाइल बरामद करने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की।

शिकायत में छीना, रिकॉर्ड में लिखा खो गया
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल पुलिस के दस्तावेज को लेकर है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, 24 अक्टूबर को गोहलपुर थाने में ‘Registration of Lost Property’ यानी खोई हुई संपत्ति के पंजीकरण के तहत रिपोर्ट दर्ज की गई। इसमें आईफोन को गुम हुई वस्तु बताया गया है। यानी पीड़ित के आवेदन में जिस घटना को दो युवकों द्वारा मोबाइल छीनकर भागने की बात कही गई, पुलिस के रिकॉर्ड में वही मोबाइल खोया हुआ दर्ज है। अब सवाल यह है कि क्या पुलिस ने पीड़ित का आवेदन ठीक से नहीं पढ़ा? क्या शिकायत दर्ज करते समय घटना का पूरा विवरण नहीं लिया गया

पीड़ित ने वीडियो बनाकर बताई परेशानी
पीड़ित ने घटना के बाद एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर भी अपनी बात रखी है। वीडियो में उसका कहना है कि मोबाइल छीनने के बाद वह शिकायत लेकर थाने पहुंचा था, लेकिन उसकी बात के मुताबिक छीना-झपटी की रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय मोबाइल गुम होने की रिपोर्ट लिखी गई। हालांकि, यह पीड़ित का आरोप है। इसकी पूरी सच्चाई पुलिस का पक्ष और थाने में हुई कार्रवाई सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
मोबाइल छिनना और खोना एक बात नहीं
आम तौर पर मोबाइल कहीं गिर जाए, छूट जाए या उसका पता न चले तो उसे गुम होने की घटना माना जाता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी के हाथ से मोबाइल छीनकर भागता है, तो मामला अलग हो जाता है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 304 में छीना-झपटी का प्रावधान है, जबकि धारा 303 चोरी से संबंधित है। घटना की परिस्थितियों के अनुसार पुलिस को उचित कानूनी प्रावधान के तहत कार्रवाई करनी होती है। यही वजह है कि शिकायत में लिखी गई बातों और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज विवरण का सही होना जरूरी है। अगर किसी के साथ छीना-झपटी हुई है, तो उसे सिर्फ मोबाइल गुम होने की रिपोर्ट तक सीमित कर देना कई सवाल खड़े करता है। इससे पीड़ित को यह भी चिंता हो सकती है कि उसके साथ हुई घटना की गंभीरता से जांच होगी या नहीं।

थाना प्रभारी से मांगा पक्ष, जवाब का इंतजार
मामले में गोहलपुर थाना प्रभारी रितेश पांडे से फोन पर संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। फोन रिसीव नहीं होने पर उन्हें व्हाट्सऐप संदेश भेजकर शिकायत और पुलिस रिकॉर्ड में अंतर को लेकर सवाल किए गए। समाचार लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था। उनका पक्ष मिलने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाएगा। अब देखना यह है कि पुलिस इस अंतर को कैसे स्पष्ट करती है। आखिर जब पीड़ित ने आवेदन में मोबाइल छीनकर भागने की बात लिखी थी, तो थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट क्यों दर्ज हुई? क्या इस घटना में आरोपियों की तलाश की जा रही है? और क्या पीड़ित की शिकायत पर छीना-झपटी के मामले में अलग से कार्रवाई होगी फिलहाल इन सवालों के जवाब का इंतजार है।
सिर्फ एक शिकायत नहीं, व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
इस मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि शहर में मोबाइल छीनने की घटनाओं की शिकायत मिलने पर पुलिस किस तरह कार्रवाई करती है। पिछले एक साल में मोबाइल छीने जाने की कितनी शिकायतें मिलीं, उनमें कितनी एफआईआर दर्ज हुईं और कितने मामलों में मोबाइल बरामद किए गए, इसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। इससे यह भी पता चल सकेगा कि शिकायतों पर पुलिस की कार्रवाई कितनी प्रभावी रही है। हालांकि, केवल इस एक मामले के आधार पर यह कहना ठीक नहीं होगा कि पुलिस जानबूझकर छीना-झपटी के मामलों को गुमशुदगी में दर्ज कर रही है। लेकिन जब शिकायत और पुलिस रिकॉर्ड में अंतर सामने आता है, तो उसका जवाब देना भी जरूरी हो जाता है।
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