जबलपुरमध्य प्रदेशराज्य

डोरीलाल की चिंता : जो कायर हैं वो कायर ही रहेंगे

 

देखिये मेरे अंदर अचानक परिवर्तन हुआ है। एक दम जादू के जैसा। रात को जब मैं सोया तो मैं बिलकुल नारमल था। इतना नार्मल था कि मैं कांग्रेसी था। मैंने राहुल जी का एक ट्वीट भी किया। फिर मैं सोने चला गया। गहरी नींद में सोया। रात में सपने देखे। सुबह उठा तो मुझे एकदम एबनार्मल लगने लगा। मुझे लगा मैं गलत हूं। मुझे सही हो जाना चाहिए। मुझे दिखना बंद हो गया। मेरी दुम टांगों के बीच में घुस गई। उसी समय मुझे लगने लगा कि मैं अब तक देश के विकास के विरूद्ध था। मैं देशद्रोही था। मैं सनातन विरोधी था। अचानक मेरे अंदर परिवर्तन होने लगा। मैं तेजी से भगवा मफलर लेने दौड़ने लगा। पास के ही मंदिर में मुझे मफलर मिल गया। मैं तुरंत भाजपा में चला गया। अब मैं मिमियाने लगा हूं। अब मै सिंह नहीं रहा। अब मैं लोमड़ी हो गया हूं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।

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मगर आपने सोचा तो होगा ?

सोचने का काम हमारा नहीं है। हम हुक्म के गुलाम हैं। हमें सोचा हुआ मिलता है। वही हमारी खुराक है। मैं आपको बताऊं कि रात को जब मैं सोया तो मेरी बुद्धि मेरा दिमाग मेरे पास था। रात को शायद खोपड़ी खुली रह गयी और दिमाग कहीं इधर उधर गिर गया। तब से सोचने समझने की शक्ति से महरूम हूं।

मगर आपके भाजपा में जाने का कारण क्या था ?

देखिये भाजपा में जो जाता है वो उस कारण से जाता है जो बताया जा नहीं सकता। असली कारण तो गोपनीय रहता है। इसलिए भाजपा में जाने का कारण भाजपा खुद बताती है। मेरा वो कागज खो गया है। ये सब हमें लिखा हुआ मिलता है। फिर भी मैं आपको बता सकता हूं कि पहला तो ये कि मुझे मोदी जी के नेतृत्व और नीतियों पर पूरा भरोसा है। दूसरी बात ये है कि राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का न्यौता कांग्रेस ने ठुकराया उससे मैं बहुत आहत हुआ। और तीसरा ये कहना है कि हम सनातन का विरोध नहीं सह सकते।

ये जो आपने कारण गिनाये इनका क्या मतलब है ?

मतलब अतलब न पूछिये। बड़े बड़े प्रोफेसर लोग यही कारण गिना रहे हैं फिर हम तो खिलाड़ी ठहरे। हमें तो लिख कर दिया गया है। सो हम कह रहे हैं। इतनी बुद्धि होती तो वहीं कांग्रेस में न रहे आते। देखो जी साफ बात है। आदमी अपना जमीर बेचता है तो कोई कारण तो होगा। पहला होता है लोभ लालच। ये किसी भी चीज का हो सकता है। दूसरा है डर। भय बिनु होत न प्रीति। हमें डर लगा। हम डर गये। तीसरा होता है ब्लैकमेल। चौथा होता है गुंडों से कौन नहीं डरता। आज हमारे देश में सत्ताधारी दल और ईडी, सीबीआई, इन्कम टैक्स पुलिस वगैरह समानार्थी शब्द हैं। छापा ईडी मारती है और प्रेस कान्फ्रेंस भाजपा करती है। न्याय की हालत ये है कि जज का नाम सुनकर लोग निर्णय बता देते हैं। तो कारण तो गये चूल्हे में। काम धंधा बंद हो जाए। जेल जाना पड़ जाए। बदनामी हो जाए। इससे अच्छा भाजपा में चले जाओ। आपको मालूम है जी एक झूठा मुकदमा आपके ऊपर लग जाए न तो अदालत, वकील, केस, जमानत, जेल करते करते घर द्वार जमीन जायदाद सब बिक जाता है।

आपको शर्म नहीं आई? अभी आप ब्रजभूषण सिंह के खिलाफ थे। महिला पहलवानों की लड़ाई में शामिल थे।

शर्म किसको आती है ? साफ साफ बिक जाते हैं, साफ साफ झूठ बोलते हैं उनको कोई शर्म है ? महिला पहलवानों पर इतने अत्याचार हुए, न अत्याचार करने वालों को शर्म आई और न अत्याचार देखने वालों को शर्म आई। केस दर्ज कराने में तेल निकल गया। मगर अत्याचारी के साथ कितनी मजबूती से खड़ी रही सरकार। और आम जनता ? उसकी तो बात न करो। हाथरस कठुआ सब भूल गये। कौन खड़ा हुआ उन लड़कियों के साथ ? गांधी के हे राम वाले रातों रात नाथूराम के साथ जा खड़े हुए और शर्म न आई तो मुझे क्यों आए। हां हम लोग बेशर्म हैं और बेशर्म रहेंगे। बेशर्म हुए बिना दलबदल किया जा सकता है क्या ?

अब दलबदल के बाद क्या कर रहे हैं ?

क्या करना है? हमें ये करना है कि हमें कुछ नहीं करना है। हमें गोदाम में डाल दिया गया है। हम जैसे बहुत सारे डले हुए हैं। हम घर से बाहर निकलेंगे तो लोग हमारे ऊपर थूकेंगे। तो हम गोदाम में रहेंगे। चुनाव के बाद हमारा कोई उपयोग नहीं रहेगा। तब हम देखेंगे कि किस लायक बचे हैं। हममें से कई लोग तो घरों में गुमनाम पड़े थे। वो जहां थे वहां भी किसी काम के नहीं थे। उनका ठीक रहा। उनने दलबदल किया तो उनका नाम अखबार में आ गया। लोगों ने याद कर लिया कि अच्छा ये अभी भी जिंदा हैं। जो पंच और वार्ड मेम्बर नहीं बन सकते, उन्हें बड़े नेता कह दिया गया। हम लोग ताश की गड्डी के जोकर हैं। जिन्हें खेल से पहले अलग करके डिब्बे में डाल दिया जाता है।

आप आज अपना क्या मूल्यांकन करते हैं ?

हम लोग माल (प्रोडक्ट) के ऊपर लगाए जाने वाला रैपर हैं। यदि माल घटिया हो तो रैपर अच्छा होने से बिक जाता है। दाम भी अच्छे मिल जाते हैं। तो हमारे कारण कुछ दिन तक घटिया माल अच्छे दाम पर बिक जाएगा। फिर हमारा वही होना है जो रैपर का होता है। कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाएगा। हमारा जीवन तब तक का है जब तक माल खरीद न लिया जाए और ग्राहक हमें कचरा मानकर फेंक न दे। फिर भी हम खुशकिस्मत हैं कि हमें कम से कम रैपर लायक तो समझा गया। इसके लिए हम माल का शुक्रिया अदा करते हैं।

हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आए कभी तो मत रोना

डोरीलाल सत्यप्रेमी

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Yash Bharat

Editor With मीडिया के क्षेत्र में करीब 5 साल का अनुभव प्राप्त है। Yash Bharat न्यूज पेपर से करियर की शुरुआत की, जहां 1 साल कंटेंट राइटिंग और पेज डिजाइनिंग पर काम किया। यहां बिजनेस, ऑटो, नेशनल और इंटरटेनमेंट की खबरों पर काम कर रहे हैं।

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