मरीजों की सुरक्षा पर सवाल: 70 साल पुराने मेडिकल कॉलेज की जर्जर दीवारें लोहे के सहारे
हादसे के इंतजार में मेडिकल कॉलेज?

जबलपुर,यशभारत। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का करीब 70 वर्ष पुराना भवन अब गंभीर खतरे की ओर इशारा कर रहा है। अस्पताल की पुरानी बिल्डिंग के कई हिस्से कमजोर और जर्जर हो चुके हैं। स्थिति यह है कि कमजोर हिस्सों को गिरने से बचाने के लिए लोक निर्माण विभाग को टेम्परेरी इमरजेंसी प्रॉपिंग लगाकर लोहे के सपोर्ट देने पड़े हैं। यह व्यवस्था फिलहाल जर्जर हिस्सों को अतिरिक्त सहारा देकर संभावित दुर्घटना को रोकने के लिए की गई है, लेकिन इससे भवन की वास्तविक स्थिति का अंदाजा भी लगाया जा सकता है।
पुरानी बिल्डिंग में मरीजों, उनके परिजनों, डॉक्टरों और कर्मचारियों की लगातार आवाजाही रहती है। ऐसे में छत या छज्जे का कोई हिस्सा अचानक गिरना गंभीर हादसे का कारण बन सकता है। पिछले समय में भवन के अलग-अलग हिस्सों में छत का प्लास्टर और छज्जों के हिस्से गिरने की घटनाएं सामने आती रही हैं। अब कमजोर हिस्सों को लोहे के सपोर्ट से थामने की जरूरत पड़ना अस्पताल की संरचनात्मक स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
पेइंग वार्ड की तरफ सबसे ज्यादा चिंता
पुराने अस्पताल भवन में पेइंग वार्ड की तरफ संरचनात्मक स्थिरता और सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी बरती जा रही है। इसी हिस्से में कमजोर भागों को तत्काल सहारा देने के लिए PWD की ओर से टेम्परेरी इमरजेंसी प्रॉपिंग का काम किया जा रहा है। इसका मकसद जर्जर हिस्सों को गिरने से रोकना और मरीजों व कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि अस्थायी लोहे के सपोर्ट लगाए जाने के बाद तत्काल खतरा कुछ कम किया जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि करीब सात दशक पुराने भवन को आखिर कब तक अस्थायी सहारों के भरोसे चलाया जाएगा? अस्पताल प्रशासन और संबंधित विभाग के सामने अब स्थायी समाधान की चुनौती है।
न्यूरोसर्जरी से सुपर स्पेशलिटी तक सीपेज की समस्या

मेडिकल कॉलेज अस्पताल के केवल पुराने भवन की जर्जरता ही चिंता का विषय नहीं है। अस्पताल के विभिन्न हिस्सों में सीपेज यानी पानी के रिसाव की समस्या भी लगातार बनी हुई है। न्यूरोसर्जरी विभाग से लेकर सुपर स्पेशलिटी विंग तक कई स्थानों पर पानी रिसने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। बारिश के दौरान सीपेज की समस्या और गंभीर हो जाती है। छतों और दीवारों में लंबे समय तक पानी का रिसाव भवन की स्थिति को और कमजोर कर सकता है। ऐसे में अस्पताल की पुरानी इमारत में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सूचना देने और पैबंद लगाने से कब तक चलेगा काम?
जर्जर हिस्सों की शिकायत सामने आने पर आमतौर पर PWD को सूचना दी जाती है और जरूरत के मुताबिक मरम्मत या अस्थायी सुरक्षा इंतजाम किए जाते हैं। लेकिन करीब 70 वर्ष पुराने भवन में अब छोटे-मोटे सुधार से आगे बढ़कर व्यापक स्तर पर संरचनात्मक जांच और स्थायी मरम्मत की जरूरत है। अस्पताल में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज और उनके परिजन पहुंचते हैं। ऐसे में भवन की सुरक्षा को केवल तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी हिस्से के अचानक गिरने की स्थिति में जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है।
बड़े हादसे से पहले जरूरी है स्थायी समाधान
टेम्परेरी इमरजेंसी प्रॉपिंग लगाकर कमजोर हिस्सों को सहारा देना तत्काल सुरक्षा के लिहाज से जरूरी कदम है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। जरूरत है कि पूरे पुराने भवन का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराया जाए। जहां मरम्मत संभव है, वहां मजबूत और गुणवत्तापूर्ण मरम्मत कराई जाए और जो हिस्से बेहद कमजोर हो चुके हैं, उनके पुनर्निर्माण या सुरक्षित तरीके से हटाने की योजना बनाई जाए।







