अस्पताल में 60 लाख का गड़बड़ झाला : 6 से अधिक पर एफआईआर

यशभारत डिंडौरी ।जिला अस्पताल डिंडौरी में 60 लाख रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आने से स्वास्थ्य विभाग में हलचल मच गई है। मामले में छह से अधिक लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इनमें जिला अस्पताल के वर्तमान सिविल सर्जन, पूर्व सीएमएचओ रमेश मरावी, पूर्व सीएमएचओ आरके मेहरा सहित अन्य लोगों के नाम बताए जा रहे हैं। हालांकि, मामले में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच एवं आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर होना आवश्यक है।
जिला अस्पताल जैसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थान में यदि शासकीय राशि के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो यह बेहद गंभीर मामला है। सरकारी अस्पतालों का बजट मरीजों के उपचार, दवाइयों, आवश्यक उपकरणों और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए खर्च किया जाता है। ऐसे में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आने से अस्पताल की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
लाखों के वेतन के बाद भी सरकारी राशि पर सवाल!
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को शासन की ओर से वेतन और अन्य निर्धारित सुविधाएं दी जाती हैं। इसके बावजूद यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी पर शासकीय राशि के दुरुपयोग के आरोप लगते हैं, तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आम जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकारी धन के उपयोग में कथित गड़बड़ी कैसे हुई, इसके लिए जिम्मेदार कौन है और संबंधित अधिकारियों ने अपने दायित्वों का निर्वहन किस प्रकार किया।
दोषियों पर हो कठोर कार्रवाई
जिला अस्पताल में कथित वित्तीय अनियमितता के मामले में निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान करने और दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कठोर कार्रवाई करने की मांग उठ रही है। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई से लेकर सेवा संबंधी कठोर कदम तक नियमानुसार उठाए जाने चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
जांच और जवाबदेही से ही सामने आएगा सच
अब इस पूरे मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि कथित घोटाले की राशि किन मदों में खर्च हुई, वित्तीय अनियमितता किस स्तर पर हुई और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की क्या भूमिका रही। संबंधित जांच एजेंसियों और स्वास्थ्य विभाग को मामले की निष्पक्ष जांच कर तथ्यों को सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि जनता का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि गरीब मरीजों के उपचार और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए निर्धारित सरकारी धन के कथित दुरुपयोग के मामले में जांच कब पूरी होगी और जिम्मेदार पाए जाने वालों पर कब कार्रवाई होगी?







