सृजन से श्रृंगार तक…मिट्टी को मां भवानी बनाने में जुटे मूर्तिकार
साढ़े 300 सौ से ज्यादा दुर्गा प्रतिमाओं के सृजन का कार्य अंतिम दौर में

सृजन से श्रृंगार तक…
मिट्टी को मां भवानी बनाने में जुटे मूर्तिकार
साढ़े 300 सौ से ज्यादा दुर्गा प्रतिमाओं के सृजन का कार्य अंतिम दौर में

बंगाल से आए कारीगरों के अलावा स्थानीय हुनर भी जुटा
कटनी, यशभारत। रात का सन्नाटा गहराता है, लेकिन शहर की कई कार्यशालाओं में रोशनी अब भी जल रही है। फर्श पर बिखरी मिट्टी, दीवार से टिके बांस के ढांचे और सामने अधूरी प्रतिमाओं के बीच कारीगरों के हाथ लगातार चल रहे हैं। कोई चेहरे की आंखों की रेखा सुधार रहा है, कोई रंग की परत चढ़ा रहा है तो कोई मुकुट और आभूषणों को अंतिम आकार दे रहा है। बाहर नवरात्रि की तैयारी है और भीतर मां के स्वरूप को पूर्ण करने की दौड़।
● खूबसूरत पंडालों मे विराजित होंगी..
11 अक्टूबर से नवरात्रि शुरू होने के साथ ही शहर के पंडालों में ये प्रतिमाएं विराजेंगी। कटनी और आसपास के इलाकों में इस बार साढ़े तीन सौ से अधिक छोटी-बड़ी दुर्गा प्रतिमाओं पर काम चल रहा है। बरही रोड, आदर्श कॉलोनी, कुठला, खिरहनी रोड समेत अलग-अलग स्थानों पर अस्थायी कार्यशालाएं बनी हैं, जहां बंगाल से आए कारीगरों के साथ स्थानीय शिल्पकार भी जुटे हैं।
●वो बंगाल से लाते हैं चेहरे की मिट्टी
कटनी में बंगाल के कलाकारों के आने का सिलसिला करीब 50 वर्षों से जारी है। नदिया और कृष्णानगर से आने वाले कारीगर महीनों पहले पहुंचकर काम शुरू करते हैं। प्रतिमा का ढांचा बांस-लकड़ी से बनता है और उस पर मिट्टी की कई परतें चढ़ाकर आकृति उभारी जाती है। चेहरे की महीन संरचना के लिए विशेष मिट्टी बंगाल से लाई जाती है, जबकि दूसरे हिस्सों में स्थानीय मिट्टी का इस्तेमाल होता है। इसके बाद रंग, वस्त्र, आभूषण और मुकुट के जरिए प्रतिमा का स्वरूप पूरा होता है।
●लेना पड़ा हीटर का सहारा
इस बार मौसम ने भी काम की रफ्तार प्रभावित की। बारिश के चलते मिट्टी में नमी बनी रही और उसे सुखाने में ज्यादा समय लगा। कुछ कार्यशालाओं में हीटर की मदद लेनी पड़ी। समय सीमा तय होने के कारण काम रोकने की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए कारीगरों ने अतिरिक्त समय देकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
●बढ़ती महंगाई का असर
सामग्री के दाम बढ़ने से लागत भी बढ़ी है। लकड़ी, बांस, रस्सी, सुतली, रंग, आभूषण और सजावटी सामान पहले की तुलना में महंगे हुए हैं। कार्यशाला के लिए महीनों का किराया भी खर्च में शामिल होता है। कलाकारों के मुताबिक करीब 10 रुपये घनफीट वाली लकड़ी अब 40 रुपये तक पहुंच चुकी है, जबकि बांस के दाम 60 से 80 रुपये तक हैं। सजावट में भी बदलाव आया है—साधारण कागजी मुकुटों की जगह अब नक्काशीदार डिजाइन और बारीक फिनिशिंग की मांग बढ़ी है।
●डिमांड की मूर्ति…
ऊंचाई को लेकर समितियों की पसंद अलग-अलग है। अधिकांश जगहों पर सौम्य और सामान्य आकार को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन बड़े स्वरूप भी तैयार हो रहे हैं। इस बार 13 फीट की काली माता और 16 फीट की महिषासुर मर्दिनी जैसे स्वरूप भी बनाए गए हैं।
●लोकल हुनर भी लाज़बाब
स्थानीय कलाकार राजकुमार चंदन ने पिता से चित्रकला और मूर्तिकला सीखी। इसी हुनर को आगे बढ़ाते हुए वे अब कई वर्षों से प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। इस बार उनकी 11 फीट की दुर्गा प्रतिमा महोबा जाएगी। उनकी बनाई प्रतिमाएं कटनी के अलावा मैहर, सतना, दमोह, रीठी और बहोरीबंद सहित अन्य क्षेत्रों में भी पहुंचती हैं। फिनिशिंग और सजावट में बेटी स्नेहा उनका हाथ बंटाती हैं। बरही रोड के विजय चक्रवर्ती भी परिवार से मिली कला को आगे बढ़ाते हुए ऑर्डर के अनुसार प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।
●1960 के दशक से जुड़ा है इतिहास
कटनी में दुर्गा प्रतिमाओं और दशहरा झांकियों के निर्माण की परंपरा 1960 के दशक से जुड़ी है। स्व. रामदास अग्रवाल ‘लल्लू भैया’ से शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ डिजाइन और तकनीक में बदलाव के बावजूद कायम है। हर साल नए प्रयोग जुड़ते हैं, लेकिन मिट्टी को देवी के स्वरूप में ढालने की मूल कला वही रहती है।
अब कार्यशालाओं में आखिरी काम चल रहा है। चेहरे की रेखाओं से लेकर रंग की चमक और आभूषणों की सजावट तक हर हिस्सा जांचा जा रहा है। कुछ ही दिनों में ये प्रतिमाएं पंडालों की रौनक बनेंगी और श्रद्धालु इनके दर्शन करेंगे। शहर को जो भव्यता दिखाई देगी, उसके पीछे महीनों तक खामोशी में चलते रहे इन्हीं हाथों की मेहनत होगी।
●क्या कहते है कलाकार…
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■ चेहरे के भाव पर ज्यादा बारीकी
जून से टीम के साथ काम कर रहे हैं। इस बार करीब 50 गणेश और 125 दुर्गा प्रतिमाएं तैयार की हैं। बदलती तकनीक के साथ अब फिनिशिंग और चेहरे के भावों पर ज्यादा बारीकी से काम करना पड़ता है।
कार्तिक पाल
कोलकाता
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■ बढ़ती महंगाई का असर
इस बार 100 से अधिक गणेश और करीब 60 दुर्गा प्रतिमाएं तैयार की हैं। बारिश से मिट्टी सुखाने में दिक्कत आई। महंगाई के कारण लकड़ी, बांस और दूसरी सामग्री की लागत भी बढ़ी है।
गोपी नाथ
बंगाल
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■ 16 फुट की महिषासुर मर्दनी का निर्माण
पिता शम्भू पेंटर से ही सीखी कला को आगे बढ़ा रहे हैं। इस बार 11 फीट की दुर्गा, 13 फीट की काली माता और 16 फीट की महिषासुर मर्दिनी तैयार की है। उनकी प्रतिमाएं कई जिलों तक जाती हैं।
चंदन मूर्ति कार
स्थानीय कलाकार
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■ फिनिशिंग का ही है कमाल
प्रतिमाओं की फिनिशिंग और सजावट में पिता का सहयोग करती हैं। अंतिम चरण में चेहरे की बारीकियों, रंग और आभूषणों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
स्नेहा पटेल
उभरती प्रतिभा
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