जमीन सौदेबाजी : तीसरे आरोपी को नहीं मिली अग्रिम जमानत, अपूर्ण विवेचना और आरोपियों का फरार होना बना आधार, सीएसपी और अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की दबिश

कटनी, यशभारत। जमीन सौदबाजी मामले में नया अपडेट सामने आया है। इस प्रकरण के मुख्य किरदार जमीन के खरीददार मारूफ अहमद हनफी की अग्रिम जमानत याचिका को प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश सुश्री लीला लोधी ने ने खारिज कर दिया है। इसके पहले कोर्ट ने सीएसपी नेहा पच्चीसिया और मुख्य फाइनेंसर क्षितिज राज बारापात्रे की भी जमानत अर्जियां निरस्त की जा चुकी है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रकरण में विवेचना अभी अपूर्ण है। आरोपी लगातार फरार हैं और यदि जमानत दी जाती है तो गवाहों को प्रभावित करने और आरोपियों के फरार होने की प्रबल आशंका बनी रहेगी। गौरतलब है कि बहुचर्चित सीएसपी जमीन सौदेबाजी मामले में कुठला थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही तीनों आरोपी नगर पुलिस अधीक्षक नेहा पच्चीसिया, क्षितिज राज बारापात्रे एवं मारूफ अहमद हनफी फरार हो गए थे, जिनकी तलाश के लिए एसआईटी द्वारा मध्यप्रदेश के साथ ही दूसरे प्रदेशों में दबिश दी जा रही है। गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपियों ने न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका लगाई, जो कि खारिज हो गई है। इस मामले में जमीन के क्रेता मारूफ अहमद हनफी की ओर से अधिवक्ता प्रसन्नकांत चतुर्वेदी ने धारा 482 बीएनएसएस के तहत जमानत अर्जी लगाई। जिसमे कहा गया कि यह मामला 92 लाख रुपये के बकाया भुगतान से जुड़ा है, जो विशुद्ध रूप से दीवानी प्रकृति का लेनदेन है, इसे आपराधिक रूप देना गलत है। आवेदक 75 वर्षीय वयोवृद्ध नागरिक हैं और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। उनका पूर्व में कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है। 15 अप्रैल को हुई रजिस्ट्री के मामले में 19 अगस्त को एफआईआर दर्ज कराई गई, जो अत्यधिक विलंब और संदेह को दर्शाती है। विशेष लोक अभियोजक सुखलाल मार्को और आपत्तिकर्ता अधिवक्ता अवनीश तिवारी ने केस डायरी के आधार पर जमानत का विरोध किया। जांच रिपोर्ट के अनुसार 1 जुलाई को मारूफ हनफी के खाते में महज 3036 रुपये थे। जमीन खरीदी के दिन 15 अप्रैल को क्षितिज राज बारापात्रे ने मारूफ हनफी के खाते में 15 लाख रुपये ट्रांसफर किए थे, जिससे साबित होता है कि मारूफ केवल एक मुखौटा (डमी खरीदार) थे। 82.46 लाख रुपये की सरकारी गाइडलाइन दर और 1.07 करोड़ रुपये में तय सौदे वाली जमीन को दबाव बनाकर महज 18-20 लाख रुपये में ले लिया गया। अदालत ने अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले मप्र राज्य विरुद्ध प्रदीप शर्मा 2014 का विशेष रूप से उल्लेख किया। कोर्ट ने दोहराया कि धारा 482 बीएनएस के तहत अग्रिम जमानत की शक्तियां असाधारण हैं और इनका उपयोग केवल अपवादस्वरूप उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जहां अभियुक्त को पूरी तरह असत्य रूप से फंसाया गया प्रतीत होता हो। मामले की गंभीरता, अपूर्ण विवेचना और आरोपियों के फरार रहने के चलते न्यायालय ने अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया।






